नई दिल्ली : देश की राजधानी दिल्ली स्थित जंतर-मंतर पर हुए छात्र आंदोलन में शामिल गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय (GBU) के एक छात्र को एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की ओर से 5 लाख रुपये का नोटिस जारी किए जाने पर देश के CJI सूर्यकांत ने कड़ा रुख अपनाया है। बुधवार को मामले की सुनवाई के दौरान CJI ने नोएडा के एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट की इस कार्रवाई पर गहरा असंतोष व्यक्त करते हुए पूछा कि अदालत के स्पष्ट आदेश के बावजूद ऐसी हिम्मत कैसे हुई।
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‘कोर्ट के आदेश का उल्लंघन कोई मजिस्ट्रेट नहीं कर सकता’
लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, सीजेआई सूर्यकांत की पीठ ने नोएडा एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट द्वारा की गई इस कार्रवाई पर तल्ख टिप्पणी की। मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “किसी मजिस्ट्रेट की आदेश जारी करने की हिम्मत कैसे हो गई? हमने साफ-साफ कह दिया था कि प्रदर्शन में शामिल किसी भी छात्र के खिलाफ कोई दंडात्मक या जबरन कार्रवाई नहीं होगी। कोई भी अधिकारी या मजिस्ट्रेट उच्चतम न्यायालय के उस आदेश का उल्लंघन नहीं कर सकता।” सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित अधिकारी को अदालत के समक्ष अपना लिखित जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
शांति बंधपत्र नोटिस का पूरा मामला और आरोपों का खंडन
पूरा मामला गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के छात्र अक्षत त्रिपाठी से जुड़ा हुआ है। आरोप है कि ग्रेटर नोएडा आयुक्तालय के तृतीय कार्यकारी मजिस्ट्रेट कार्यालय की ओर से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 130 के तहत छात्र को 5 लाख रुपये का निजी मुचलका भरने के लिए शांति बंधपत्र (Peace Bond) नोटिस जारी किया गया था। सहायक पुलिस आयुक्त की सिफारिश पर की गई इस कार्रवाई में दावा किया गया था कि छात्र ने अन्य विद्यार्थियों को आंदोलन में शामिल होने के लिए उकसाया था।
हालांकि, छात्र अक्षत त्रिपाठी ने इन सभी आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि उसने केवल शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन में भाग लिया था। विवाद बढ़ने और शीर्ष अदालत के कड़े रुख के बाद इस नोटिस को वापस ले लिया गया। ‘शांति बंधपत्र नोटिस’ प्रशासन द्वारा कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए लिया जाने वाला एक एहतियाती वित्तीय आश्वासन होता है, जिसे दोषी करार देना नहीं माना जाता।
पेपर लीक आंदोलन और केंद्रीय नेतृत्व में बदलाव
गौरतलब है कि 20 जुलाई को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की अगुवाई में पेपर लीक के खिलाफ जंतर-मंतर पर व्यापक छात्र आंदोलन हुआ था, जिसमें सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक भी करीब 25 दिनों तक भूख हड़ताल पर रहे थे। उस समय भी सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस की सख्त कार्रवाइयों पर रोक लगाते हुए छात्रों को संरक्षण दिया था। आंदोलन की उग्रता और मांगों के सामने झुकते हुए सरकार ने शर्तें स्वीकार की थीं, जिसके तहत धर्मेंद्र प्रधान को शिक्षा मंत्री पद से हटाकर प्रल्हाद जोशी को यह जिम्मेदारी सौंपी गई थी।






