आदिवासी पहचान पर धर्म नहीं, परंपरा और मूल संस्कृति है आधार: डॉ. रामचंद्र उरांव

रांची : आदिवासी फाइटर्स, पारंपरिक ग्रामसभा समन्वय समिति एवं आदिवासी क्षेत्र सुरक्षा परिषद की ओर से रविवार को एसडीसी, रांची में ‘आदिवासी पहचान और अस्मिता’ विषय पर ‘आदिवासी विमर्श’ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में कानूनविदों, शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आदिवासी पहचान, संस्कृति

आदिवासी पहचान

रांची : आदिवासी फाइटर्स, पारंपरिक ग्रामसभा समन्वय समिति एवं आदिवासी क्षेत्र सुरक्षा परिषद की ओर से रविवार को एसडीसी, रांची में ‘आदिवासी पहचान और अस्मिता’ विषय पर ‘आदिवासी विमर्श’ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में कानूनविदों, शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने आदिवासी पहचान, संस्कृति और परंपरा से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर अपने विचार रखे।

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कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कानूनविद, प्रोफेसर एवं बुद्धिजीवी डॉ. रामचंद्र उरांव ने कहा कि संवैधानिक, कानूनी और पारंपरिक दृष्टि से आदिवासी होने का आधार धर्म नहीं है। उन्होंने कहा कि ‘अनुसूचित जनजाति’ और ‘आदिवासी’ दोनों शब्द समानार्थी नहीं हैं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय का उल्लेख करते हुए कहा कि न्यायालय ने भी ‘आदिवासी’ शब्द का उपयोग किया है। साथ ही उन्होंने कहा कि आदिवासी समुदाय की अपनी अलग परंपराएं, रीति-रिवाज और सांस्कृतिक पहचान है।

शोधकर्ता एवं लेखक ग्लैडसन डुंगडुंग ने कहा कि वर्तमान समय में आदिवासी पहचान और संस्कृति से जुड़े विभिन्न पहलुओं को लेकर भ्रम फैलाने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि मानवशास्त्र, समाजशास्त्र, इतिहास, आनुवंशिक विज्ञान और भाषा विज्ञान जैसे विषयों के आधार पर आदिवासी समाज को समझने की आवश्यकता है। जेएबीकेएसएस के अध्यक्ष अशुतोष चेरो ने कहा कि आदिवासी पहचान को लेकर समाज में विभिन्न प्रकार की बहसें चल रही हैं। उन्होंने कहा कि आदिवासी समुदाय की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं को संरक्षित रखने की आवश्यकता है।

सुषमा बिरूली ने कहा कि केवल आदिवासी परंपराओं का पालन या पारंपरिक वेशभूषा अपनाने से कोई व्यक्ति आदिवासी नहीं हो जाता। उन्होंने कहा कि आदिवासी पहचान में मूल वंश, भाषा, संस्कृति, परंपरा और सामाजिक विरासत की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। एल.एम. उरांव ने कहा कि आदिवासी समाज की पहचान और अस्तित्व को सुरक्षित रखना समय की आवश्यकता है। वहीं विनसाय मुंडा ने आदिवासी समाज की एकजुटता पर बल देते हुए कहा कि समुदाय को आपसी मतभेदों से ऊपर उठकर अपनी सांस्कृतिक विरासत को मजबूत करना चाहिए।

ज्योति भेंगरा ने कहा कि धर्म से पहले आदिवासी पहचान महत्वपूर्ण है और समाज को आपसी एकता बनाए रखनी चाहिए। वहीं पी.सी. मुर्मू ने कहा कि अलग-अलग धर्म मानने वाले आदिवासी समुदायों के बीच सामाजिक सौहार्द बना रहा है और इसे बनाए रखना जरूरी है। कार्यक्रम में छुनकू मुंडा, शिबू होरो, मेरी क्लाउडिया सोरेंग, वाल्टर कंडुलना, मर्शल तियू, अनिल कोल, जयप्रकाश हुरहुरिया सहित कई बुद्धिजीवी और सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित रहे।

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