नई दिल्ली। \संसद के दोनों सदनों ने विपक्षी सदस्यों के लगातार नारेबाजी के बीच ध्वनि मत से ‘जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, 2026’ पारित कर दिया। विधेयक का उद्देश्य जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969 के प्रावधानों में संशोधन करना है ताकि मौजूदा नियमों को और सख्त बनाया जा सके।  इसके तहत, दो वर्ष से अधिक समय बाद किए गए जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण के लिए प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश की आवश्यकता अनिवार्य होगी।
दो साल से अधिक की देरी होने पर मामले हाईकोर्ट के अधीन न्यायिक अधिकारी (प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट) के पास जाते हैं, न कि राज्य सरकार के अधीन जिला प्रशासक, कार्यकारी मजिस्ट्रेट के पास.
मुख्य अंतर यह है कि दो साल पुराने जन्म या मृत्यु के सत्यापन के लिए अब कलेक्टर कार्यालय के बजाय अदालत प्रणाली का उपयोग करना होगा. विधेयक के साथ प्रस्तुत उद्देश्यों और कारणों के विवरण में बताया गया है – विलंबित पंजीकरण को अधिक सख्त बनाना और समय पर रिपोर्टिंग को प्रोत्साहित करना है।
विधेयक को लोकसभा और राज्यसभा ने पारित कर दिया. राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद, यह संशोधन उस तिथि से लागू होगा जिसे केंद्र सरकार आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचित करेगी। पिछले तीन वर्षों में यह दूसरी बार है जब संसद ने एक ऐसे कानून में संशोधन करने का प्रस्ताव रखा है, जिसका सामना अधिकांश लोगों को केवल तभी करना पड़ता है जब उन्हें अपने जन्म का प्रमाण देना होता है।
वर्तमान कानून के तहत, एक वर्ष के बाद रिपोर्ट की जाने वाली किसी भी जन्म या मृत्यु के लिए सत्यापन और निर्धारित शुल्क के भुगतान के बाद जिला मजिस्ट्रेट, उप-विभागीय मजिस्ट्रेट या डीएम द्वारा अधिकृत कार्यकारी मजिस्ट्रेट के आदेश की आवश्यकता होती थी।  अब संशोधित कानून के तहत दो वर्ष तक के विलंब के लिए भी यह प्रावधान लागू रहेगा.
 30 दिन से एक वर्ष के बीच के पंजीकरण के लिए जिला रजिस्ट्रार की लिखित अनुमति, स्व-सत्यापित दस्तावेजों और शुल्क की आवश्यकता होती है.
– एक से दो वर्ष तक की देरी के मामलों की सुनवाई कार्यकारी मजिस्ट्रेट के माध्यम से होती है. एग्जेक्यूटिव मजिस्ट्रेट राज्य सरकार के तहत काम करती है.
– दो वर्ष से अधिक की देरी के मामलों के लिए अब प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश की आवश्यकता होती है. फर्स्ट क्लास ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट हाईकोर्ट के अधीन होते हैं।
सरकार ने 2023 में ही पंजीकृत जन्म और मृत्यु के राष्ट्रीय डेटाबेस को वैधानिक दर्जा दे दिया था। इस दस्तावेज का उपयोग अलग-अलग जगहों पर किया जा सकता है। जैसे- शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश, ड्राइविंग लाइसेंस, मतदाता सूची तैयार करना, विवाह पंजीकरण, सरकारी नियुक्तियां, पासपोर्ट, आधार कार्ड जारी करना और केंद्र द्वारा अधिसूचित किसी भी अन्य उद्देश्य में।
विपक्षी सदस्यों की लगातार नारेबाजी के बीच बहस का जवाब देते हुए गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने कहा कि कई सदस्यों ने प्रस्तावित कानून के महत्व को समझाया है और विपक्ष से इसके उद्देश्य को समझने का आग्रह किया।
उन्होंने कहा कि मोदी सरकार यह सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है कि देश में पैदा होने वाले प्रत्येक बच्चे का पंजीकरण हो और प्रत्येक मृत्यु का रिकॉर्ड रखा जाए, ताकि मृत व्यक्ति “फर्जी मतदाता” बनकर “तुष्टीकरण की राजनीति” करने वाली पार्टियों को लाभ न पहुंचा सकें।
उन्होंने आरोप लगाया, “कांग्रेस ने जन्म और मृत्यु पंजीकरण के नाम पर इस देश को धोखा दिया.” विधेयक पर हंगामे के बीच चर्चा हुई और मंत्री ने बाद में बहस का जवाब दिया, जबकि विपक्षी सदस्यों ने सदन में शाह की उपस्थिति की मांग करते हुए नारे लगाए।