नागपुरी भाषा-साहित्य के पुरोधा डॉ. विशेश्वर प्रसाद केशरी की 93वीं जयंती पर भावपूर्ण स्मरण

रांची । रांची विश्वविद्यालय के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा केन्द्र स्थित स्नातकोत्तर नागपुरी विभाग में आज टीआरएल विभाग के प्रथम प्रभारी विभागाध्यक्ष एवं नागपुरी भाषा-साहित्य के विशिष्ट विद्वान की 93वीं जयंती श्रद्धा एवं सम्मान के साथ मनाई गई। इस अवसर पर उनकी तस्वीर पर माल्यार्पण


रांची । रांची विश्वविद्यालय के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा केन्द्र स्थित स्नातकोत्तर नागपुरी विभाग में आज टीआरएल विभाग के प्रथम प्रभारी विभागाध्यक्ष एवं नागपुरी भाषा-साहित्य के विशिष्ट विद्वान की 93वीं जयंती श्रद्धा एवं सम्मान के साथ मनाई गई। इस अवसर पर उनकी तस्वीर पर माल्यार्पण एवं पुष्प अर्पित कर केन्द्र के शिक्षकों, कर्मचारियों, शोधार्थियों तथा छात्र-छात्राओं ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। कार्यक्रम का संचालन डॉ. बीरेन्द्र कुमार महतो ने किया, जबकि विषय प्रवेश डॉ. मनोज कच्छप तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. रीझु नायक ने किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए नागपुरी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. उमेश नन्द तिवारी ने कहा कि डॉ. विशेश्वर प्रसाद केशरी केवल एक शिक्षक या साहित्यकार नहीं थे, बल्कि वे नागपुरी भाषा एवं संस्कृति के ऐसे युगदृष्टा व्यक्तित्व थे जिन्होंने अपनी विद्वता, शोध दृष्टि और लेखन के माध्यम से क्षेत्रीय भाषाओं को नई पहचान देने का महत्वपूर्ण कार्य किया। उनके द्वारा स्थापित शैक्षणिक एवं साहित्यिक मूल्यों से आज भी नई पीढ़ी प्रेरणा प्राप्त कर रही है।
खोरठा विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. कुमारी शशि ने कहा कि क्षेत्रीय भाषाएं किसी समाज की आत्मा होती हैं और डॉ. केशरी ने अपने समर्पण और अथक प्रयासों से इन भाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन की दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया।
रांची विश्वविद्यालय के एनएसएस कोऑर्डिनेटर डॉ. किशोर सुरिन ने कहा कि डॉ. केशरी का व्यक्तित्व शिक्षा, संस्कृति और समाज के प्रति समर्पण का अनुपम उदाहरण था। उनके विचार आज भी समाज को सकारात्मक दिशा प्रदान करने की क्षमता रखते हैं। कुरमाली विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. तारकेश्वर सिंह मुंडा ने कहा कि डॉ. केशरी का योगदान केवल नागपुरी भाषा तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के समग्र विकास के लिए निरंतर कार्य किया।डॉ. सरस्वती गागराई ने कहा कि उनका जीवन संघर्ष, सृजन और समाज के प्रति समर्पण का प्रेरणादायी उदाहरण है। वहीं डॉ. दिनेश कुमार ने कहा कि उनका साहित्यिक अवदान आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक बना रहेगा।डॉ. करम सिंह मुण्डा ने कहा कि भाषा और संस्कृति किसी समाज की पहचान होती है तथा डॉ. केशरी ने इस पहचान को सशक्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इस अवसर पर जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा केन्द्र की डॉ. अर्चना कुमारी, डॉ. नकुल कुमार, गुरूचरण पूर्ति, शकुंतला बेसरा सहित बड़ी संख्या में शोधार्थी एवं छात्र-छात्राएं उपस्थित थे। कार्यक्रम का समापन डॉ. केशरी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व के स्मरण तथा उनके आदर्शों को आगे बढ़ाने के संकल्प के साथ हुआ।

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