रांची। ज्ञान विज्ञान समिति, झारखंड द्वारा आज प्रेस क्लब, रांची में राज्य एवं राष्ट्रीय नेतृत्व की उपस्थिति में झारखंड में किए गए बेरोजगारी सर्वेक्षण के निष्कर्षों को सार्वजनिक करने के लिए एक प्रेस वार्ता आयोजित की गई।
प्रेस वार्ता को संबोधित करते हुए ज्ञान विज्ञान समिति के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. काशीनाथ चटर्जी ने कहा कि ज्ञान विज्ञान समिति पूरे देश में “भविष्य का भारत कैसा हो” विषय पर एक राष्ट्रव्यापी अभियान चला रही है। इस अभियान का उद्देश्य ऐसा भारत बनाना है जहां प्रत्येक व्यक्ति, विशेषकर प्रत्येक युवा, को सम्मानजनक और सुरक्षित रोजगार प्राप्त हो तथा वह गरिमापूर्ण जीवन जी सके। इसी अभियान के अंतर्गत ज्ञान विज्ञान समिति, झारखंड ने स्वयंसेवी आधार पर राज्य के 18 जिलों में व्यापक बेरोजगारी सर्वेक्षण कराया।
झारखंड बेरोजगारी सर्वेक्षण : प्रमुख निष्कर्ष
ज्ञान विज्ञान समिति, झारखंड द्वारा अगस्त–सितंबर 2025 के दौरान राज्य के 18 जिलों में 4,678 लोगों के बीच किए गए इस सर्वेक्षण से रोजगार की अत्यंत गंभीर और चिंताजनक स्थिति सामने आई है। यह सर्वेक्षण केवल झारखंड की स्थिति को नहीं दर्शाता, बल्कि पूरे देश में गहराते रोजगार संकट की भी स्पष्ट तस्वीर प्रस्तुत करता है।
सर्वेक्षण में शामिल 4,678 उत्तरदाताओं में 2,735 (58.47%) पुरुष तथा 1,943 (41.53%) महिलाएँ थीं। उत्तरदाताओं की औसत आयु लगभग 30 वर्ष रही। आय के प्रमुख स्रोतों में मजदूरी (59%), खेती (57.5%) तथा स्वरोजगार (15.3%) प्रमुख रहे।
सर्वेक्षण में शामिल 96 प्रतिशत उत्तरदाता शिक्षित थे। इनमें 31 प्रतिशत ने कक्षा 11–12 तक, 30 प्रतिशत ने कक्षा 6–10 तक, 19 प्रतिशत ने स्नातक तथा 3 प्रतिशत ने स्नातकोत्तर तक शिक्षा प्राप्त की थी। यह तथ्य स्पष्ट करता है कि शिक्षित युवाओं के लिए भी सम्मानजनक रोजगार उपलब्ध नहीं हो पा रहा है।
सर्वेक्षण के अनुसार 71 प्रतिशत उत्तरदाता रोजगार की तलाश में थे, जबकि 15 प्रतिशत पढ़ाई कर रहे थे। शेष लोग अनियमित मजदूरी, खेती अथवा छोटे-मोटे स्वरोजगार से जुड़े हुए थे।
रोजगार की संभावना के संबंध में 49 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि उन्हें अच्छे रोजगार की संभावना बहुत कम दिखाई देती है, 21 प्रतिशत ने कहा कि लगभग नहीं के बराबर, 15 प्रतिशत ने इसे सामान्य तथा केवल 16 प्रतिशत ने अच्छी संभावना व्यक्त की।
भविष्य को लेकर भी युवाओं में गहरी निराशा दिखाई दी। 15.3 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि उन्हें अपने भविष्य से कोई उम्मीद नहीं है, 35 प्रतिशत ने स्वयं को अत्यधिक परेशान, 26 प्रतिशत ने चिंतित बताया, जबकि एक-चौथाई से भी कम लोग अपने भविष्य को लेकर आशावादी थे।
बेरोजगारी के प्रमुख कारणों के रूप में उत्तरदाताओं ने केंद्र सरकार की नीतियों (44%), राज्य सरकार की नीतियों (43.4%), व्यवस्था की कमियाँ (42%), संसाधनों की कमी (41.6%), कौशल विकास की कमी (37.6%), संसाधनों का असमान वितरण (32.6%) तथा जनसंख्या वृद्धि (26.7%) को जिम्मेदार माना। 95 प्रतिशत से अधिक लोगों का मानना था कि समय के साथ बेरोजगारी की स्थिति और अधिक गंभीर होती जा रही है।
स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन के उपायों में उत्तरदाताओं ने खेती (60%), कृषि आधारित उद्योग (50%) तथा कुटीर उद्योग (52%) को सबसे महत्वपूर्ण माना। स्वरोजगार को बढ़ावा देने के लिए 88 प्रतिशत लोगों ने पूंजी उपलब्ध कराने, 49 प्रतिशत ने बाजार व्यवस्था को मजबूत करने, 48.8 प्रतिशत ने भूमि उपलब्ध कराने, 46.6 प्रतिशत ने कौशल प्रशिक्षण तथा 30 प्रतिशत ने ऊर्जा आपूर्ति को आवश्यक बताया।
राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य
डॉ. काशीनाथ चटर्जी ने कहा कि झारखंड के इस सर्वेक्षण के निष्कर्ष पूरे देश में रोजगार के बदलते स्वरूप की ओर संकेत करते हैं। आज भारत में केवल बेरोजगारी ही नहीं, बल्कि अल्प-रोजगार (Underemployment) भी गंभीर समस्या बन चुका है। बड़ी संख्या में शिक्षित युवा अपनी योग्यता से कम स्तर का कार्य करने या अस्थायी रोजगार स्वीकार करने को विवश हैं।
उन्होंने कहा कि सरकारी एवं सार्वजनिक क्षेत्र में नियमित नियुक्तियों के स्थान पर संविदा (Contract), आउटसोर्सिंग तथा गिग अर्थव्यवस्था (Gig Economy) का विस्तार हुआ है। इससे रोजगार की सुरक्षा, समान वेतन, पेंशन, भविष्य निधि, चिकित्सा सुविधा तथा अन्य सामाजिक सुरक्षा अधिकार कमजोर हुए हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि गिग वर्क, ऑनलाइन डिलीवरी, कैब सेवा तथा ई-कॉमर्स जैसे क्षेत्रों में कार्यरत लाखों युवाओं को नियमित कर्मचारी का दर्जा, न्यूनतम वेतन और सामाजिक सुरक्षा प्राप्त नहीं है। अनेक निजी संस्थानों एवं आउटसोर्सिंग एजेंसियों में 10–12 घंटे या उससे अधिक कार्य लिया जा रहा है, जबकि वेतन अपेक्षाकृत कम है। इससे श्रमिकों का आर्थिक, शारीरिक और मानसिक शोषण बढ़ रहा है तथा आठ घंटे के कार्यदिवस का ऐतिहासिक श्रमिक अधिकार कमजोर पड़ता जा रहा है।
उन्होंने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि संकट और रोजगार की कमी के कारण पलायन लगातार बढ़ रहा है तथा शहरों में भी अधिकांश युवाओं को असंगठित क्षेत्र में असुरक्षित और कम वेतन वाला रोजगार ही उपलब्ध हो रहा है।
आगे की दिशा
डॉ. चटर्जी ने कहा कि रोजगार संकट का समाधान केवल आर्थिक विकास दर बढ़ाने से संभव नहीं होगा। इसके लिए कृषि एवं कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा देना, कुटीर एवं लघु उद्योगों का विस्तार करना, स्थानीय संसाधनों पर आधारित रोजगार सृजित करना, सरकारी रिक्त पदों पर नियमित नियुक्तियाँ करना, आउटसोर्सिंग पर निर्भरता कम करना, गिग एवं प्लेटफॉर्म श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना तथा श्रम कानूनों का प्रभावी पालन सुनिश्चित करना आवश्यक है।
अन्य वक्ताओं के विचार
राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य रवि सिंह ने बताया कि यह सर्वेक्षण अगस्त–सितंबर 2025 के दौरान लगभग 400 स्वयंसेवकों द्वारा दो माह तक चलाया गया।
राज्य अध्यक्ष शिव शंकर जी ने कहा कि पलामू जिले में सर्वेक्षण के दौरान यह अनुभव हुआ कि रोजगार के अभाव में बड़े पैमाने पर युवाओं का पलायन हो रहा है।
राज्य उपाध्यक्ष हेमंत जायसवाल ने कहा कि धनबाद जिले के गाँवों एवं कोलियरियों में रहने वाले युवाओं और परिवारों से व्यापक संवाद के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि अनेक परिवारों की दैनिक आय 200 रुपये से भी कम है और वे वस्तुतः बेरोजगारी एवं अल्प-रोजगार की स्थिति में जीवन-यापन कर रहे हैं।
राज्य महासचिव विश्वनाथ सिंह ने कहा कि सरकार रोजगार और स्किल इंडिया की बड़ी-बड़ी बातें करती है, लेकिन धरातल पर युवाओं तक उसका अपेक्षित लाभ नहीं पहुंच रहा है।
राज्य कोषाध्यक्ष एवं बोकारो जिला सचिव सुरेंद्र ठाकुर ने बताया कि बोकारो जिले में लगभग 1,500 परिवारों से संवाद किया गया। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक उद्योगों का कमजोर होना, आउटसोर्सिंग तथा गिग वर्क का बढ़ना बेरोजगारी की गंभीर स्थिति को और बढ़ा रहा है।
धनबाद जिला सचिव भोलाराम ने कहा कि अगस्त से सितंबर 2025 के दौरान घर-घर जाकर माता-पिता एवं बेरोजगार युवाओं से बातचीत की गई। उन्होंने बताया कि धनबाद में दो प्रकार की बेरोजगारी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है—अल्प-रोजगार (Underemployment) तथा पूर्ण बेरोजगारी (Unemployment)।
राज्य के 18 जिलों में सर्वेक्षण के निष्कर्षों पर जनसंवाद आयोजित किए जाएंगे
प्रेस वार्ता के अंत में ज्ञान विज्ञान समिति, झारखंड के पदाधिकारियों ने घोषणा की कि आगामी दिनों में राज्य के 18 जिलों में इस सर्वेक्षण के निष्कर्षों पर व्यापक जनसंवाद आयोजित किए जाएंगे। साथ ही, झारखंड सरकार को रोजगार सृजन के लिए एक विस्तृत नीति-परामर्श सौंपा जाएगा। समिति का मानना है कि राज्य सरकार को रोजगार के प्रश्न पर दीर्घकालिक एवं ठोस योजना बनानी होगी तथा केंद्र सरकार को भी बदलती परिस्थितियों के अनुरूप रोजगार नीति पर नए दृष्टिकोण के साथ गंभीरता से विचार करना होगा।
ज्ञान विज्ञान समिति का मानना है कि रोजगार सृजन का लक्ष्य केवल रोजगार की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक को सम्मानजनक, सुरक्षित, नियमित और सामाजिक सुरक्षा से युक्त रोजगार उपलब्ध कराना होना चाहिए।




