रांची : झारखंड के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने राज्य की पुलिस व्यवस्था और वित्त विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने झारखंड पुलिस की डीजीपी पर निशाना साधते हुए कहा कि DGP की कुर्सी पर बैठने के बाद किसी को यह नहीं समझना चाहिए कि झारखंड पुलिस उसकी “जेबी संस्था” बन गई है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि पुलिस पर अधिकार सरकार का होता है और अधिकारियों को अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन करना चाहिए।
वित्त मंत्री ने कहा कि विधायक जनता के प्रतिनिधि होते हैं और उनके अभिभावक विधानसभा अध्यक्ष हैं, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि विधानसभा किसी व्यक्ति की मनमर्जी से चलेगी। उसी तरह पुलिस विभाग भी किसी एक अधिकारी की इच्छा से नहीं, बल्कि सरकार की नीतियों और कानून के अनुसार संचालित होता है। उन्होंने कहा कि उन्होंने डीजीपी का ध्यान केवल उन कमियों की ओर आकर्षित करने का प्रयास किया था, जिन्हें दूर करने की आवश्यकता है, लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण रूप से डीजीपी ने अपने दायित्व को गंभीरता से नहीं लिया।
राधाकृष्ण किशोर ने दावा किया कि उन्होंने अपने विधानसभा क्षेत्र के नक्सल प्रभावित इलाकों में पुलिस जवानों की सुविधाओं के लिए व्यक्तिगत पहल करते हुए 11 कूलर उपलब्ध कराए। उन्होंने कहा कि जवानों की मूलभूत सुविधाओं का ध्यान रखना पुलिस नेतृत्व की जिम्मेदारी है। उनका आरोप था कि डीजीपी ने कभी नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में जाकर जवानों की वास्तविक स्थिति जानने की कोशिश नहीं की, जबकि उन्होंने स्वयं क्षेत्र में जाकर उनकी जरूरतों को समझा।
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उन्होंने पुलिस जवानों के लिए पर्याप्त वाहन उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। मंत्री ने कहा कि 16 पुलिसकर्मियों को केवल तीन वाहनों में बैठाकर ड्यूटी पर भेजना उनके साथ अन्याय है। उन्होंने कहा कि उन्होंने यह मुद्दा अपने लिए नहीं, बल्कि जवानों की सुविधा और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उठाया है। सरकार का दायित्व है कि पुलिस बल को आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए जाएं ताकि वे बेहतर ढंग से अपनी जिम्मेदारियां निभा सकें।
वित्त मंत्री ने वित्त विभाग के एक अपर सचिव स्तर के अधिकारी द्वारा कथित तौर पर एक कैबिनेट मंत्री को सरकारी वाहन लौटाने की सलाह दिए जाने के मामले को भी गंभीर बताया। उन्होंने इसे दुर्भाग्यपूर्ण और नियमों के विरुद्ध करार देते हुए वित्त सचिव से पूरे मामले में स्पष्टीकरण मांगा है। उन्होंने कहा कि यदि किसी अधिकारी ने नियमों की अनदेखी की है तो उसके खिलाफ उचित कार्रवाई की जाएगी।
इस दौरान उन्होंने विभिन्न विभागों की विकास योजनाओं से जुड़ी फाइलों में हो रही देरी के मुद्दे पर भी अपनी बात रखी। रिम्स-2 परियोजना का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि वित्त विभाग के पास आई फाइल पर उन्होंने नौ महत्वपूर्ण सवाल पूछे थे, क्योंकि वित्त मंत्री होने के नाते यह उनका अधिकार और जिम्मेदारी दोनों है। उन्होंने कहा कि किसी भी बड़ी परियोजना पर वित्तीय स्वीकृति देने से पहले सभी पहलुओं की जांच आवश्यक होती है।
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राधाकृष्ण किशोर ने यह भी बताया कि उन्होंने विभागीय अधिकारियों को निर्देश दिया है कि सभी लंबित फाइलों का पूरा ब्योरा तैयार किया जाए। इसमें यह स्पष्ट किया जाए कि कौन-सी फाइल कब विभाग में आई, किस अधिकारी या टेबल पर कितने दिनों तक लंबित रही और देरी के लिए कौन जिम्मेदार है। उन्होंने कहा कि यदि जांच में कोई अधिकारी या सेक्शन अफसर दोषी पाया जाता है तो उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
वित्त मंत्री के इन बयानों के बाद राज्य की प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में नई चर्चा शुरू हो गई है। विशेष रूप से DGP पर की गई उनकी टिप्पणी और विभागीय जवाबदेही को लेकर दिए गए बयान को लेकर अब सभी की नजर सरकार और संबंधित अधिकारियों की अगली प्रतिक्रिया पर रहेगी।




