रांची : झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) की कार्यप्रणाली और नियुक्ति प्रक्रियाओं में हो रही देरी को लेकर एक बार फिर सियासत गर्मा गई है। केंद्रीय रक्षा राज्य मंत्री और रांची से सांसद संजय सेठ ने JPSC की तत्कालीन अध्यक्ष डॉ. नीलिमा केरकेट्टा द्वारा करीब दो वर्ष पूर्व राज्य सरकार को लिखे गए पत्र का हवाला देते हुए हेमंत सरकार पर निशाना साधा है। संजय सेठ ने सवाल उठाया कि जब आयोग की अध्यक्ष ने खुद फाइलों के लंबित रहने और सदस्यों द्वारा काम लटकाने की चेतावनी दी थी, तब भी सरकार दो सालों तक चुप क्यों बैठी रही।
सदस्यों के स्तर से फाइलों को लटकाने का आरोप
संजय सेठ ने कहा कि तत्कालीन अध्यक्ष डॉ. नीलिमा केरकेट्टा ने अपने पत्र में स्पष्ट रूप से बताया था कि JPSC के सदस्यों के स्तर से कार्यों में अनावश्यक विलंब किया जा रहा है। साक्षात्कार, परीक्षाफल प्रकाशन और संस्तुति से जुड़ी महत्वपूर्ण फाइलें महीनों और सालों तक अटकाई जाती थीं। उन्होंने विश्वविद्यालयों में कुलसचिव, परीक्षा नियंत्रक, वित्त अधिकारी और शिक्षकों की बहाली से जुड़ी फाइलों का जिक्र करते हुए बताया कि इस रवैये से आयोग को कई बार अनावश्यक रूप से अदालतों में भी घसीटा गया।
सुधार के लिए दिए गए थे स्पष्ट सुझाव
तत्कालीन अध्यक्ष ने विंडिकेशन और स्क्रूटिनी की प्रक्रिया को अधिकतम तीन दिनों में पूरा करने, 2002 की नियमावली में संशोधन करने और सदस्यों की अनुपस्थिति से काम प्रभावित न हो, इसके लिए अध्यक्ष को विशेषाधिकार देने का सुझाव दिया था। संजय सेठ के अनुसार, संयुक्त असैनिक प्रतियोगिता परीक्षा (जिसमें DSP, वित्त, वाणिज्य कर, श्रम और शिक्षा सेवा जैसे पद शामिल हैं) के परिणाम चार महीने बाद भी केवल औपचारिक प्रक्रियाओं के नाम पर लंबित रखे गए थे। इसके कारण राज्य को विकास योजनाओं के लिए जरूरी मानव संसाधन नहीं मिल पाया और हजारों युवाओं का भविष्य अधर में लटक गया।
संजय सेठ ने सरकार से पूछे तीखे सवाल
केंद्रीय मंत्री ने राज्य सरकार से मांग करते हुए कहा कि:
तत्कालीन अध्यक्ष के पत्र पर अब तक क्या कार्रवाई की गई, उसे तुरंत सार्वजनिक किया जाए।
लंबित पड़ी सभी नियुक्ति प्रक्रियाओं की उच्चस्तरीय समीक्षा की जाए।
JPSC की कार्यप्रणाली में हो रही देरी और अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच कराई जाए।
संजय सेठ ने कहा कि यह केवल एक प्रशासनिक पत्र का मामला नहीं है, बल्कि यह झारखंड के हजारों युवाओं के भविष्य और पारदर्शी व्यवस्था का सवाल है। यदि सरकार की मंशा साफ होती तो दो साल पहले ही इन बिंदुओं पर कड़ा संज्ञान लिया गया होता।








