झारखंड में रक्षाबंधन पर अनोखी पहल, 1 लाख पेड़ों को राखी बांधेंगे ग्रामीण

रांची : झारखंड में रक्षाबंधन के पर्व को प्रकृति संरक्षण से जोड़ने की अनूठी पहल की जा रही है। राज्य के 700 गांवों में हजारों ग्रामीण शुक्रवार को लगभग 1 लाख पेड़ों को राखी बांधकर उनकी रक्षा और संरक्षण का संकल्प लेंगे। यह आयोजन ‘पेड़

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रांची : झारखंड में रक्षाबंधन के पर्व को प्रकृति संरक्षण से जोड़ने की अनूठी पहल की जा रही है। राज्य के 700 गांवों में हजारों ग्रामीण शुक्रवार को लगभग 1 लाख पेड़ों को राखी बांधकर उनकी रक्षा और संरक्षण का संकल्प लेंगे। यह आयोजन ‘पेड़ बचाओ अभियान’ के तहत किया जा रहा है, जिसका मुख्य उद्देश्य लोगों को पर्यावरण और वनों के प्रति भावनात्मक रूप से जोड़ना और जागरूक करना है।

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गुमला के जोराड़ गांव से होगी अभियान की शुरुआत

प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) संजीव कुमार ने बताया कि रक्षाबंधन के दिन शुरू होने वाला यह अभियान पूरे एक महीने तक चलेगा। इस दौरान झारखंड के सभी 24 जिलों के चिन्हित गांवों में कुल 3 लाख पेड़ों को राखी बांधने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। अभियान की औपचारिक शुरुआत गुमला जिले के जोराड़ गांव से होगी, जहां प्रधान मुख्य वन संरक्षक स्वयं एक पेड़ को राखी बांधकर इसका शुभारंभ करेंगे। संजीव कुमार ने कहा कि रक्षाबंधन भाई-बहन के रिश्ते का पर्व है, जिसमें सुरक्षा का संकल्प लिया जाता है। इसी पावन भावना को प्रकृति से जोड़ते हुए पेड़ों की रक्षा का संकल्प दिलाया जा रहा है, क्योंकि केवल पौधे लगाना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि उनकी नियमित देखभाल और सुरक्षा भी अत्यंत आवश्यक है।

धनबाद के लुकैया गांव से 2004 में शुरू हुई थी यह पहल

पेड़ों को राखी बांधने की यह परंपरा वर्ष 2004 में धनबाद जिले के टुंडी प्रखंड स्थित लुकैया गांव से शुरू हुई थी। उस समय यह क्षेत्र माओवाद से प्रभावित माना जाता था। संजीव कुमार के अनुसार, इस पहल के जरिए धीरे-धीरे ग्रामीणों को वन संरक्षण से जोड़ा गया और अब तक झारखंड के 12,000 से अधिक गांव इस अभियान से जुड़ चुके हैं। अकेले लुकैया गांव में इस अभियान के माध्यम से 20,000 से अधिक महुआ के पेड़ों को संरक्षित किया गया, जो आज ग्रामीणों की आजीविका का मुख्य साधन बन चुके हैं।

आजीविका को सहारा और वन क्षेत्र में 1,128 वर्ग किमी की वृद्धि

‘पेड़ बचाओ अभियान’ का प्रभाव न केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित रहा है, बल्कि इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिली है। महुआ और अन्य लघु वनोपज (Minor Forest Produce) के संरक्षण से कई गांवों के लोगों को अतिरिक्त आय का जरिया मिला है। प्रधान मुख्य वन संरक्षक ने भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि राज्य में जनभागीदारी और वन विभाग के प्रयासों से वनों का दायरा बढ़ा है। वर्ष 2001 से लेकर पिछले दो दशकों के दौरान झारखंड के कुल वन क्षेत्र में 1,128 वर्ग किलोमीटर की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

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