रांची : जैन धर्म के पर्वराज पर्युषण के तहत दशलक्षण महापर्व के दूसरे दिन उत्तम मार्दव धर्म मनाया गया। आचार्य 108 श्री ज्ञेयसागर जी महाराज के ससंघ सानिध्य में रांची स्थित श्री दिगंबर जैन मंदिर में परम पूज्य मुनिश्री 108 नियोग सागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित किया। मुनिश्री ने कहा कि मार्दव का अर्थ कोमलता और विनम्रता है। उन्होंने कहा, “जहां मान है, वहां भगवान नहीं और जहां भगवान हैं, वहां मान नहीं।” उनके अनुसार मान कषाय व्यक्ति के पतन का कारण बनता है। रावण के विनाश का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि अहंकार व्यक्ति को झुकने नहीं देता और जो झुकता नहीं, वह टूट जाता है।
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मुनिश्री ने स्पष्ट किया कि मार्दव का अर्थ कमजोर होना नहीं है। ज्ञान, बल, धन, रूप, जाति और कुल का अभिमान नहीं करना ही मार्दव धर्म है। जो व्यक्ति अपने से बड़ों का सम्मान और छोटों से प्रेम करता है, वही इस धर्म का पालन करता है। उन्होंने कहा कि पानी हमेशा नीचे की ओर बहता है और इसी कारण सबको शीतलता देता है। उसी तरह विनम्र व्यक्ति के पास ज्ञान आता है, जबकि अहंकारी व्यक्ति को कोई ज्ञान नहीं दे सकता। आत्मस्वभाव के आश्रय में मान कषाय की उत्पत्ति न होने देना ही मार्दव धर्म है।
दोनों जैन मंदिरों में हुई विशेष पूजा
रांची स्थित दोनों जैन मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना की गई। इस दौरान मंदिर श्रद्धालुओं से भरे रहे। अपर बाजार जैन मंदिर के बड़े हॉल में वाद्य यंत्रों के साथ संगीतमय सामूहिक पूजन हुआ। विद्वान प्रदीप शास्त्री पियूष ने पूजन के बाद शास्त्र वाचन और मंडल पूजन कराया। इस अवसर पर रविंद्र कुमार, विशाल कुमार, प्रकाश कुमार गोधा एवं राजेंद्र कुमार, संजय कुमार बड़जात्या परिवार की ओर से अपर बाजार मंदिर में शांतिधारा की गई।
वासुपूज्य जिनालय में अमित कुमार, राकेश कुमार रारा परिवार एवं संजय कुमार, नवीन कुमार पापड़ीवाल परिवार की ओर से शांतिधारा की गई। सामूहिक पूजन में शांतिधारा का सौभाग्य अभय, अजय, जितेंद्र छाबड़ा, चंचल, वंश टोंग्या, टिकमचंद, प्रमोद कुमार, प्रदीप कुमार झांझरी, विजय कुमार, अमन कुमार छाबड़ा को मिला।




