नयी दिल्ली । गुजरात हाई कोर्ट ने कोर्ट मैरिज से जुड़े एक मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि अगर हिंदू विवाह में सात फेरे जैसी पारंपरिक रस्में नहीं की गईं, तो सिर्फ रजिस्ट्रेशन के आधार पर उसे वैध हिंदू विवाह नहीं माना जा सकता है।
उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि हिंदू विवाह की पारंपरिक रस्में व्यक्ति के आध्यात्मिक जीवन को शुद्ध करती हैं और उसे बदल देती हैं. ये रस्में बहुत जरूरी हैं।
दरअसल, यह फैसला पिछले साल नवंबर में फैमिली कोर्ट के एक आदेश को रद्द करते हुए आया है। फैर्मिली कोर्ट ने ब्रिटेन में रहने वाले कौशल सोनार की अपील को खारिज कर दिया था। उन्होंने अपनी कथित शादी को अमान्य घोषित करने की मांग की थी। जस्टिस इलेश वोरा और जस्टिस आर. टी. वाच्छानी की बेंच ने साफ कहा कि सप्तपदी यानी सात फेरे जैसी जरूरी रस्में हिंदू विवाह की मूल आधार हैं।
सिर्फ रजिस्ट्रेशन से विवाह वैध नहीं
कोर्ट ने कहा कि बिना इनके सिर्फ रजिस्ट्रेशन से विवाह वैध नहीं होता। कौशल सोनार ने कोर्ट को बताया कि उन्हें इस कथित शादी के बारे में तब पता चला, जब प्रतिवादी ने उनके माता-पिता से संपर्क किया और मैरिज सर्टिफिकेट देकर दावा किया कि वह उनकी पत्नी है। सोनार ने कहा कि उन्होंने इस महिला के साथ कभी शादी नहीं की, कोई हिंदू रस्में नहीं निभाईं और न ही कभी उसके साथ पति-पत्नी की तरह रहा।
कोर्ट ने दिया धारा 7 का हवाला
हाई कोर्ट ने पाया कि महिला ने खुद फैमिली कोर्ट में साफ-साफ स्वीकार किया था कि उनके बीच कोई रस्म या समारोह नहीं हुआ और दोनों के बीच कभी पति-पत्नी का रिश्ता भी नहीं रहा. इसके बावजूद फैमिली कोर्ट ने कौशल सोनार की याचिका खारिज कर दी, जो गलत था. अदालत ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 7 का हवाला दिया।
इसमें कहा गया है कि हिंदू विवाह को पूरा और वैध बनाने के लिए पारंपरिक रस्में और समारोह जरूरी हैं। कोर्ट ने कहा कि चूंकि इस मामले में कोई रस्म या समारोह आयोजित ही नहीं किया गया था, इसलिए हिंदू विवाह की बुनियादी शर्तें पूरी नहीं हुईं। इसलिए यह विवाह वैध नहीं है।




