23 साल पुराने मोरहाबादी भूमि विवाद में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, आदिवासी रैयत की जमीन बहाली का आदेश बरकरार

राँची: झारखंड हाईकोर्ट ने राजधानी रांची के पॉश इलाके मोरहाबादी स्थित 1.22 एकड़ जमीन से जुड़े 23 साल पुराने भूमि विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. कोर्ट ने छोटानागपुर काश्तकारी (CNT) अधिनियम की धारा 71A के तहत आदिवासी रैयत की जमीन बहाल करने के आदेश

राँची: झारखंड हाईकोर्ट ने राजधानी रांची के पॉश इलाके मोरहाबादी स्थित 1.22 एकड़ जमीन से जुड़े 23 साल पुराने भूमि विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. कोर्ट ने छोटानागपुर काश्तकारी (CNT) अधिनियम की धारा 71A के तहत आदिवासी रैयत की जमीन बहाल करने के आदेश को बरकरार रखा. न्यायाधीश अनुभा रावत चौधरी की एकल पीठ ने डॉ. एच.पी. नारायण एवं वीणा नारायण द्वारा दायर दोनों रिट याचिकाओं को खारिज कर दिया. मामला बरियातू थाना क्षेत्र के मोरहाबादी स्थित खाता संख्या 77, प्लॉट संख्या 1123 की 1.22 एकड़ भूमि से जुड़ा है. आदिवासी पक्ष का दावा था कि जमीन के मूल खतियानी रैयत भूवा उरांव और मुसमात बुधनी ने वर्ष 1940 में रजिस्टर्ड बिक्री पत्र के माध्यम से यह जमीन हरिहर उरांव को बेची थी.

हरिहर उरांव के पुत्र बैजनाथ उरांव की मानसिक स्थिति ठीक नहीं रहने का लाभ उठाकर वर्ष 1976-80 के दौरान उन्हें जमीन से बेदखल कर दिया गया. इसके बाद उनकी पत्नी कुआरी टोप्पो ने वर्ष 1983 में SAR कोर्ट में धारा 71A के तहत जमीन बहाली की याचिका दायर की थी. वहीं, याचिकाकर्ताओं का कहना था कि मूल रैयत ने 1943 में जमीन जमींदार को सरेंडर कर दी थी और बाद में जमींदार ने सदा हुकुमनामा के माध्यम से शेख रहमान अली को छप्परबंदी बंदोबस्ती दी. शेख रहमान अली से वर्ष 1979 में डॉ. एच.पी. नारायण और वीणा नारायण ने जमीन खरीदी थी. उनका तर्क था कि जमीन का स्वरूप बदल चुका है, इसलिए CNT एक्ट लागू नहीं होता और बहाली की याचिका समय-सीमा से बाधित है.

हाईकोर्ट ने दोनों रिट याचिकाएं की खारिज

हाईकोर्ट ने इन सभी दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में विफल रहे कि जमीन का स्वरूप विधिसम्मत तरीके से छप्परबंदी में बदल गया था. अदालत ने कहा कि 1940 में रजिस्टर्ड बिक्री के बाद 1943 में उसी जमीन के सरेंडर और सदा हुकुमनामा की कहानी कानूनी रूप से स्वीकार्य नहीं है. केवल राजस्व रसीद या अंचल अधिकारी की रिपोर्ट से जमीन का मूल स्वरूप नहीं बदल जाता. अदालत ने यह भी माना कि बैजनाथ उरांव की मानसिक अस्वस्थता का लाभ उठाकर उन्हें बेदखल किया गया था और वर्ष 1983 में दायर बहाली आवेदन बेदखली के आठ वर्षों के भीतर दाखिल किया गया था.

इसलिए इसे समय-सीमा से बाधित नहीं माना जा सकता. हाईकोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि टाइटल सूट संख्या 151/72 और टाइटल अपील संख्या 117/77 में सिविल कोर्ट पहले ही वर्ष 1940 की रजिस्टर्ड बिक्री के आधार पर बैजनाथ उरांव के स्वामित्व और अधिकार की पुष्टि कर चुका था. अदालत ने कहा कि SAR कोर्ट, उपायुक्त और प्रमंडलीय आयुक्त द्वारा पारित आदेशों में कोई कानूनी या प्रक्रियागत त्रुटि नहीं है. इसके साथ ही कोर्ट ने दोनों रिट याचिकाएं खारिज करते हुए कुआरी टोप्पो और उनके उत्तराधिकारियों के पक्ष में जमीन बहाली के आदेश को पूरी तरह बरकरार रखा.

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