रांची। झारखंड हाईकोर्ट ने छोटानागपुर काश्तकारी (सीएनटी) अधिनियम के तहत भूमि पुनर्बहाली (एसएआर) मामलों में अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि दशकों पुराने मामलों को अनिश्चितकाल तक दोबारा नहीं खोला जा सकता। अदालत ने कहा कि किसी मामले का अंतिम निर्णय हो जाने के बाद उसे वर्षों बाद फिर से चुनौती देना कानून के सिद्धांतों के विपरीत है।
जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की एकलपीठ ने अमर कुमार चौधरी की याचिका पर सुनवाई करते हुए वर्ष 2008 में अतिरिक्त समाहर्ता, रांची द्वारा पारित एसएआर अपील के आदेश और दक्षिण छोटानागपुर प्रमंडल के आयुक्त के पुनरीक्षण आदेश को रद्द कर दिया। साथ ही वर्ष 1988 में एसएआर अधिकारी द्वारा पारित मूल आदेश को बहाल कर दिया।
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि उनके पिता ने वर्ष 1947 में 1.32 एकड़ विवादित भूमि खरीदकर उसका कब्जा प्राप्त किया था। वर्ष 1962 में भूमि को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ, जिसके बाद टाइटल सूट दायर किया गया। वर्ष 1965 में समझौते के आधार पर मामले का निपटारा हो गया।
इसके बाद वर्ष 1986-87 में एसएआर मामला दायर हुआ, जिसमें 1988 में आदेश पारित कर वैकल्पिक भूमि हस्तांतरित की गई। इसके आधार पर बिक्री विलेख का पंजीकरण और म्यूटेशन भी हो गया। हालांकि, लगभग 18 वर्ष बाद वर्ष 2006 में उसी भूमि विवाद को लेकर दोबारा नया एसएआर मामला दायर किया गया।
हाईकोर्ट ने कहा कि वर्ष 1988 के आदेश को कभी चुनौती नहीं दी गई थी, इसलिए वह अंतिम रूप ले चुका था। ऐसे में उसी विवाद को दोबारा उठाना न केवल रेस-जुडिकाटा (पूर्व निर्णय की बाध्यता) के सिद्धांत के विरुद्ध है, बल्कि अत्यधिक विलंब के कारण भी स्वीकार्य नहीं है।
अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि अपीलीय और पुनरीक्षण प्राधिकार ने यह मान लिया था कि विवादित भूमि पर कोई स्थायी संरचना नहीं थी, जबकि रिकॉर्ड में उपलब्ध गवाहों के बयान और दस्तावेजों का समुचित मूल्यांकन नहीं किया गया। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार भी ऐसा कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सकी, जिससे यह सिद्ध हो सके कि भूमि पर स्थायी संरचना मौजूद नहीं थी।
हाईकोर्ट के इस फैसले को सीएनटी अधिनियम के तहत लंबित और पुराने भूमि विवादों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि वर्षों पहले अंतिम रूप से निपटाए जा चुके मामलों को बिना ठोस कानूनी आधार के दोबारा नहीं खोला जा सकता।




