नई दिल्ली : महज 20 रुपये की कथित रिश्वत से जुड़ा एक मामला करीब तीन दशकों (30 साल) तक देश की अदालतों में खिंचता रहा। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस ऐतिहासिक और लंबे चले मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए दोनों पूर्व सरकारी कर्मचारियों को सभी आरोपों से पूरी तरह बरी कर दिया है। गौरतलब है कि निचली अदालत ने दोनों कर्मचारियों को दोषी मानते हुए एक-एक साल की सजा सुनाई थी, जिसके चलते उन्हें अपनी सरकारी नौकरियों से भी हाथ धोना पड़ा था।
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1996 का है पूरा मामला
यह मामला वर्ष 1996 का है, जो कि एक नागरिक के आय प्रमाण पत्र (Income Certificate) जारी करने से संबंधित था। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि आय प्रमाण पत्र बनवाने के लिए कर्मचारियों ने कुल 120 रुपये की रिश्वत मांगी थी। इसमें से 100 रुपये एक कर्मचारी के लिए और 20 रुपये दूसरे कर्मचारी के लिए तय किए गए थे। शिकायतकर्ता की सूचना पर एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) ने ट्रैप बिछाया था। कार्रवाई के दौरान आरोपी कर्मचारी के पास से 20 रुपये का नोट बरामद हुआ, जिसके आधार पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच का बड़ा फैसला
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की। पीठ ने कहा कि किसी भी भ्रष्टाचार या रिश्वतखोरी के मामले में दोष साबित करने के लिए ‘रिश्वत की मांग’ का साबित होना सबसे अनिवार्य तत्व है। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि केवल आरोपी के पास से 20 रुपये का नोट बरामद हो जाने मात्र से उसकी दोषसिद्धि कायम नहीं रखी जा सकती, जब तक कि रिश्वत मांगने का ठोस और संदेह से परे प्रमाण न पेश किया गया हो। अभियोजन पक्ष इस मुख्य दलील को अदालत में साबित करने में विफल रहा।
तीन दशक बाद मिला न्याय, पर गंवानी पड़ी नौकरी
करीब 30 सालों तक चली इस लंबी और थका देने वाली कानूनी लड़ाई के बाद आखिरकार सुप्रीम कोर्ट से दोनों पूर्व कर्मचारियों को बड़ी राहत और न्याय मिला है। हालांकि, तीन दशक लंबे इस मुकदमे के दौरान उन्हें अपनी नौकरी और सामाजिक प्रतिष्ठा का भारी नुकसान उठाना पड़ा।








