पुरी : भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा भारत के सबसे प्रमुख धार्मिक आयोजनों में से एक मानी जाती है। हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को निकाली जाने वाली इस यात्रा में भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा भव्य रथों पर विराजमान होकर नगर भ्रमण करते हैं। रथ यात्रा की शुरुआत को लेकर पुराणों और लोक परंपराओं में कई कथाएं प्रचलित हैं। इनमें से चार प्रमुख मान्यताएं सबसे अधिक प्रसिद्ध हैं।
राजा इंद्रद्युम्न और अधूरी मूर्तियों की कथा
पहली कथा के अनुसार, राजा इंद्रद्युम्न ने भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियों के निर्माण का कार्य विश्वकर्मा को सौंपा था। शर्त यह थी कि मूर्ति निर्माण के दौरान कोई भी कक्ष का द्वार नहीं खोलेगा। लेकिन रानी गुंडिचा ने उत्सुकतावश समय से पहले द्वार खोल दिया, जिससे विश्वकर्मा वहां से चले गए और मूर्तियां अधूरी रह गईं।
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कथा के अनुसार, तभी आकाशवाणी हुई कि भगवान इसी स्वरूप में विराजमान होना चाहते हैं। इसके बाद अधूरी मूर्तियों की ही स्थापना की गई। स्कंद पुराण के उत्कल खंड में उल्लेख मिलता है कि आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के दिन भगवान के जन्मस्थान जाने की परंपरा शुरू हुई, जिसे आज रथ यात्रा के रूप में मनाया जाता है।
सुभद्रा की इच्छा और नगर भ्रमण
दूसरी मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण और बलराम ने अपनी बहन सुभद्रा की द्वारिका भ्रमण की इच्छा पूरी करने के लिए उन्हें रथ पर बैठाकर नगर की यात्रा कराई थी। इसी घटना की स्मृति में पुरी में हर वर्ष रथ यात्रा निकाली जाती है। इस परंपरा का उल्लेख स्कंद पुराण, नारद पुराण, पद्म पुराण और ब्रह्म पुराण में भी बताया जाता है।
राधारानी और वृंदावन की कथा
तीसरी कथा के अनुसार, राधारानी ने कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण से वृंदावन आने का आग्रह किया था। श्रीकृष्ण जब बलराम और सुभद्रा के साथ वृंदावन पहुंचे तो वहां के लोगों ने प्रसन्न होकर तीनों को रथ पर बैठाया और स्वयं रथ खींचते हुए नगर भ्रमण कराया। मान्यता है कि उसी समय वृंदावनवासियों ने श्रीकृष्ण का “जग के नाथ” यानी जगन्नाथ के रूप में जयघोष किया। इसके बाद यह परंपरा आगे चलकर जगन्नाथ धाम पुरी से भी जुड़ गई।
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चारण परंपरा से जुड़ी मान्यता
चौथी कथा चारण परंपरा से जुड़ी है। इसके अनुसार, भगवान द्वारिकाधीश, बलराम और सुभद्रा के अग्निदाह के समय समुद्र में आए तूफान के कारण उनके अधजले अवशेष पुरी के समुद्र तट तक पहुंच गए। पुरी के राजा ने तीनों को अलग-अलग रथों पर विराजमान कर नगर भ्रमण कराया। कथा में यह भी कहा गया है कि समुद्र से बहकर आई दारु (पवित्र लकड़ी) से पेटियां बनवाई गईं और उनमें अवशेषों को रखकर भूमि में समर्पित किया गया। चारण परंपरा के अनुसार, इसी घटना की स्मृति में रथ यात्रा की परंपरा निभाई जाती है।




