रांची : झारखंड हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की अदालत ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि केवल घरेलू विवाद के दौरान बहू को डांटना या अपशब्द कहना भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 498ए के तहत ‘क्रूरता’ नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष क्रूरता साबित करने के लिए आवश्यक कानूनी साक्ष्य पेश करने में असफल रहा।
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इसी आधार पर हाईकोर्ट ने सास की दोषसिद्धि और तीन वर्ष के कठोर कारावास की सजा रद्द करते हुए उसकी आपराधिक अपील स्वीकार कर ली। चूंकि अपीलकर्ता पहले से जमानत पर थी, इसलिए उसे जमानती बंधपत्रों से भी मुक्त कर दिया गया।
गुड़ के शीरे का बर्तन बना विवाद की वजह
हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि आरोपी के व्यवहार के कारण मृतका आत्महत्या के लिए मजबूर हुई या उसके मानसिक अथवा शारीरिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मामले में दहेज की मांग या दहेज प्रताड़ना का कोई आरोप नहीं था। अभियोजन के अनुसार, विवाद केवल इस बात पर हुआ था कि मृतका ने दीवार पर रखा गुड़ के शीरे का बर्तन नीचे जमीन पर रख दिया था। इस पर सास ने उसे डांटा और अपशब्द कहे। अदालत ने कहा कि इसके अलावा आरोपी के खिलाफ किसी गंभीर उत्पीड़न या प्रताड़ना का आरोप साबित नहीं हुआ।
निचली अदालत के फैसले पर भी टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा कि सात वर्षों के वैवाहिक जीवन के दौरान लगातार क्रूरता या प्रताड़ना का कोई विश्वसनीय साक्ष्य पेश नहीं किया गया। अदालत ने यह भी माना कि निचली अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों का समुचित मूल्यांकन नहीं किया और आरोपी का बयान दर्ज करते समय यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि उसने किस प्रकार की क्रूरता या उत्पीड़न किया था।
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क्या था मामला?
अभियोजन के अनुसार, 20 जनवरी 2001 को मृतका ने दीवार पर ऊंचाई पर रखे गुड़ के शीरे का बर्तन उतारकर जमीन पर रख दिया था। इससे नाराज होकर सास ने उसे डांटा और अपशब्द कहे। आरोप है कि इसके बाद मृतका ने आंगन में बने मिट्टी के चूल्हे से जलती आग लेकर खुद को आग के हवाले कर दिया। गंभीर रूप से झुलसने के बाद इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। जांच के दौरान आत्महत्या के लिए उकसाने की धारा भी जोड़ी गई थी। अभियोजन ने आरोप लगाया था कि विवाह के बाद सात वर्षों तक सास ने मृतका के साथ क्रूरता की, लेकिन हाईकोर्ट ने पाया कि इस आरोप के समर्थन में कोई ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया।
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