रांची : विशेष आवश्यकता वाले बच्चों यानी दिव्यांग बच्चों को सुरक्षित और प्यार भरा परिवार दिलाने के लिए दत्तक ग्रहण की प्रक्रिया को आसान बनाने पर जोर दिया गया है। इसी उद्देश्य से केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (CARA) ने मंगलवार को रांची में पूर्वी क्षेत्र की पांचवीं क्षेत्रीय कार्यशाला आयोजित की। इसमें चार राज्यों के करीब 175 हितधारकों ने हिस्सा लिया।
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महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, भारत सरकार के अधीन CARA ने झारखंड सरकार और राज्य दत्तक ग्रहण संसाधन एजेंसी (SARA), झारखंड के सहयोग से यह कार्यशाला आयोजित की। इसका मकसद विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के पुनर्वास के लिए परिवार-आधारित व्यवस्था को मजबूत करना और उन्हें गोद लेने की प्रक्रिया में आने वाली दिक्कतों को दूर करना था।
चार राज्यों के करीब 175 हितधारक हुए शामिल
यह कार्यशाला दत्तक ग्रहण जागरूकता अभियान 2025 के तहत आयोजित की गई। अभियान का विषय विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के गैर-संस्थागत पुनर्वास को बढ़ावा देना है। पूर्वी क्षेत्र में झारखंड, बिहार, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और सिक्किम शामिल हैं। कार्यशाला में झारखंड, बिहार, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के करीब 115 जिलों से लगभग 175 प्रतिनिधि शामिल हुए। इस दौरान अलग-अलग राज्यों में अपनाई जा रही अच्छी कार्यप्रणालियों को साझा करने और बच्चों के पुनर्वास के लिए मिलकर काम करने पर चर्चा हुई।
कार्यशाला में CARA की मुख्य कार्यकारी अधिकारी भावना सक्सेना, DWCD&SS के सचिव उमाशंकर सिंह, राज्य दिव्यांगजन आयुक्त कीर्ति श्री, झारखंड की समाज कल्याण निदेशक किरण पासी और JSCPS के निदेशक एवं सदस्य सचिव विजय कुमार सिन्हा समेत कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।
दत्तक ग्रहण की बाधाएं दूर करने पर जोर
कार्यशाला को संबोधित करते हुए CARA की CEO भावना सक्सेना ने कहा कि जागरूकता बढ़ाने और विभिन्न हितधारकों की भागीदारी से उत्साहजनक प्रगति हुई है। उन्होंने दत्तक ग्रहण की प्रक्रिया में आने वाली बाधाओं को दूर करने और संभावित दत्तक माता-पिता को जरूरी सहयोग उपलब्ध कराने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि लगातार जागरूकता अभियान चलाने और बच्चों की जरूरतों को ध्यान में रखकर काम करने से अधिक से अधिक विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को स्थायी परिवार मिल सकता है।
वहीं, DWCD&SS के सचिव उमाशंकर सिंह ने कहा कि दिव्यांग बच्चों को भी पारिवारिक जीवन, देखभाल और अपनत्व के समान अवसर मिलने चाहिए। इसके लिए सिर्फ जागरूकता फैलाना काफी नहीं है, बल्कि लगातार ऐसे कदम उठाने होंगे जिनका फायदा सीधे बच्चों को मिले। उन्होंने बाल संरक्षण प्राधिकरणों, स्वास्थ्य सेवा से जुड़े पेशेवरों और दत्तक ग्रहण एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत बताई, ताकि बच्चों के हित में ठोस परिणाम सामने आ सकें।
स्वास्थ्य और बाल संरक्षण विभागों में बेहतर तालमेल की जरूरत
कार्यशाला में राज्य दत्तक ग्रहण संसाधन एजेंसियों (SARAs), विशिष्ट दत्तक ग्रहण एजेंसियों (SAAs), बाल देखभाल संस्थानों (CCIs), जिला बाल संरक्षण इकाइयों (DCPUs), मुख्य चिकित्सा पदाधिकारियों (CMOs), बाल कल्याण समितियों (CWCs), स्वास्थ्य संस्थानों और बाल संरक्षण संगठनों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। चर्चा के दौरान बच्चों के चिकित्सकीय आकलन, कानूनी और प्रक्रियात्मक जरूरतों, वित्तीय मामलों, शिकायत निवारण और अलग-अलग विभागों के बीच समन्वय जैसी चुनौतियों पर बात हुई। खास तौर पर स्वास्थ्य संस्थानों और बाल संरक्षण व्यवस्था के बीच बेहतर तालमेल बनाने की जरूरत बताई गई, ताकि बच्चों का समय पर मेडिकल मूल्यांकन हो सके और उनकी जरूरत के मुताबिक देखभाल की योजना तैयार की जा सके।
समूह चर्चाओं में हितधारकों ने जागरूकता बढ़ाने, संस्थानों की क्षमता मजबूत करने, प्रक्रियागत अड़चनें दूर करने और दत्तक ग्रहण की पूरी प्रक्रिया के दौरान बच्चों को बेहतर सहयोग देने के सुझाव भी तैयार किए।
सफल दत्तक ग्रहण पर बनी लघु फिल्म का अनावरण
कार्यशाला में विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के सफल दत्तक ग्रहण पर आधारित एक लघु वृत्तचित्र फिल्म का अनावरण भी किया गया। वास्तविक घटना पर आधारित इस फिल्म में दिखाया गया कि प्यार और सहयोग देने वाला परिवार बच्चों को सुरक्षा, भावनात्मक सहारा, सम्मान और अपनत्व का एहसास दे सकता है। रांची में आयोजित यह कार्यशाला CARA की क्षेत्रीय परामर्श श्रृंखला की पांचवीं कड़ी रही। इससे पहले राजस्थान में उत्तरी क्षेत्र, असम में उत्तर-पूर्वी क्षेत्र, मध्य प्रदेश में केंद्रीय क्षेत्र और महाराष्ट्र में पश्चिमी क्षेत्र के लिए कार्यशालाएं आयोजित की जा चुकी हैं।
इस कार्यशाला से मिले सुझावों के आधार पर दत्तक ग्रहण की प्रक्रिया को बेहतर बनाने, स्वास्थ्य सेवाओं और बाल संरक्षण व्यवस्था के बीच तालमेल मजबूत करने तथा विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को परिवार दिलाने के अवसर बढ़ाने की दिशा में आगे काम किए जाने की उम्मीद है। CARA का कहना है कि हर बच्चे को सिर्फ देखभाल ही नहीं, बल्कि ऐसे परिवार में रहने और आगे बढ़ने का मौका भी मिलना चाहिए, जहां उसे प्यार, सम्मान, अपनत्व और जरूरत के मुताबिक सहयोग मिले।




