नई दिल्ली : जैन और हिंदू धर्म की साझा संस्कृति का एक समृद्ध इतिहास रहा है। जिस तरह हिंदू परंपराओं में रक्षाबंधन के त्योहार को लेकर पुराणों में विविध कथाएं मिलती हैं, ठीक उसी तरह जैन धर्म में भी इस पर्व को मनाने के पीछे एक विशेष और ऐतिहासिक मान्यता है। जैन समुदाय में रक्षाबंधन का पर्व एक महामुनि द्वारा 700 मुनियों के प्राणों और संयम की रक्षा करने की घटना पर आधारित है।
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उज्जैनी के मंत्रियों से विवाद और शास्त्रार्थ
जैन ग्रंथों के अनुसार, हस्तिनापुर के राजा महापद्म ने अपने बड़े पुत्र पद्मराज (पद्मराय) को राजपाठ सौंपकर वैराग्य धारण कर लिया था। उनके छोटे पुत्र विष्णुकुमार भी पिता के साथ मोक्ष मार्ग पर अग्रसर होकर मुनि बन गए। दूसरी ओर, उज्जैनी नगरी के राजा श्रीवर्मा के चार मंत्री – बलि, नमुचि, बृहस्पति और प्रहलाद थे, जो जैन धर्म के विरोधी थे। एक समय आचार्य अकंपनाचार्य अपने 700 शिष्यों के साथ उज्जैनी पधारे। मंत्रियों के अभिमानी और विरोधी स्वभाव को जानकर आचार्य ने संघ को मौन रहने का निर्देश दिया। परंतु, नगर से लौट रहे श्रुतसागर मुनि को इस निर्देश का पता नहीं था। जब मंत्रियों ने मुनियों का उपहास उड़ाया, तो श्रुतसागर मुनि ने उनसे शास्त्रार्थ किया और मंत्रियों को पराजित कर दिया।
मंत्रियों का षड्यंत्र और हस्तिनापुर में उपसर्ग
शास्त्रार्थ में पराजित होकर अपमानित महसूस कर रहे मंत्रियों ने रात में ध्यानमग्न श्रुतसागर मुनि पर हमला करने का प्रयास किया, लेकिन वनदेव ने उन्हें स्तब्ध कर दिया। राजा को जानकारी मिलते ही चारों मंत्रियों को देश से निकाल दिया गया। इसके बाद चारों मंत्री हस्तिनापुर पहुंचे और राजा पद्मराय से कूटनीति से सेवा का अवसर प्राप्त किया। मंत्री बलि ने एक विद्रोही राजा को पराजित कराकर राजा पद्मराय से एक वरदान मांग लिया। कुछ समय बाद जब आचार्य अकंपनाचार्य का 700 मुनियों का संघ हस्तिनापुर आया, तो बलि ने अपने वरदान के बदले राजा से सात दिनों के लिए राजपाठ मांग लिया। राजा बनकर बलि ने मुनि संघ जिस स्थान पर ठहरा था, वहां चारों तरफ कांटेदार बाड़ा बनवाकर नरमेध यज्ञ के नाम पर पशुओं की हड्डियां, मांस और चमड़ा जलाना शुरू कर दिया। इस दूषित वातावरण और दुर्गंध से मुनियों का सांस लेना कठिन हो गया और उन्होंने अन्न-जल त्यागकर समाधि ले ली।
मुनि विष्णुकुमार का आगमन और 700 मुनियों की रक्षा
मिथिलापुर के आचार्य सागरचंद्र ने अपने अवधिज्ञान से इस संकट को जाना और अपने शिष्य पुष्पदंत को धरणीभूषण पर्वत पर साधना कर रहे विष्णुकुमार मुनि के पास भेजा। विष्णुकुमार मुनि के पास विक्रिया ऋद्धि थी। विष्णुकुमार मुनि तुरंत हस्तिनापुर आए और वामन ब्राह्मण का रूप धारण कर बलि के पास पहुंचे। बलि ने उनसे इच्छा मांगने को कहा, जिस पर मुनि ने केवल तीन कदम (डग) भूमि मांगी। ऋद्धि के प्रभाव से मुनि ने अपना आकार बढ़ाया और दो ही कदमों में सुमेरु तथा मानुषोत्तर पर्वत तक नाप लिया। तीसरा कदम रखने के लिए स्थान न बचने पर बलि ने अपनी पीठ प्रस्तुत की। मुनि के प्रभाव से भयभीत होकर देवों व असुरों के हस्तक्षेप के बाद बलि ने अपना अपराध स्वीकार किया और यज्ञ बंद कर मुनियों पर आया उपसर्ग दूर किया।
श्रावण पूर्णिमा का महत्व और रक्षाबंधन की शुरुआत
नगरवासियों और श्रावकों ने 700 मुनियों की सेवा (वैयावृत्ति) की और उन्हें पुनः सामान्य स्थिति में लाए। इसके बाद मुनियों को खीर, सेवइयां और मिष्ठान्न का आहार कराया गया। जिस दिन मुनियों के संकट का निवारण हुआ, वह श्रावण मास की पूर्णिमा का दिन था। इस रक्षा दिवस की स्मृति में लोगों ने हाथों में सूत के डोरे बांधे और खुशियां मनाईं। तभी से जैन परंपरा में रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाने लगा। आज भी जैन परिवारों में इस दिन खीर बनाई जाती है और मुनि विष्णुकुमार की कथा का वाचन कर पर्व मनाया जाता है।



