रांची पहाड़ी मंदिर : दुनिया का एकमात्र शिव मंदिर जहां आजादी की आधी रात से फहराया जा रहा तिरंगा

रांची : झारखंड की राजधानी रांची के हृदयस्थल में स्थित प्रसिद्ध पहाड़ी मंदिर न केवल अटूट धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यह देश के स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीय गौरव का जीवंत प्रतीक भी है। यह भारत का एकमात्र मंदिर और वेटिकन सिटी के बाद

पहाड़ी मंदिर

रांची : झारखंड की राजधानी रांची के हृदयस्थल में स्थित प्रसिद्ध पहाड़ी मंदिर न केवल अटूट धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यह देश के स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीय गौरव का जीवंत प्रतीक भी है। यह भारत का एकमात्र मंदिर और वेटिकन सिटी के बाद दुनिया का दूसरा ऐसा धार्मिक स्थल है, जहां स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त) और गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) पर धार्मिक ध्वज के साथ-साथ राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहराने की ऐतिहासिक परंपरा है।

14 अगस्त 1947 की आधी रात का ऐतिहासिक जश्न

14 अगस्त 1947 की रात, जब दिल्ली में पंडित जवाहरलाल नेहरू अपना ऐतिहासिक भाषण ‘ट्रिस्ट विद डेस्टिनी’ दे रहे थे, ठीक उसी समय रांची के स्वतंत्रता सेनानी नागेश्वर साहू, गंगा प्रसाद और बुधवा उरांव के नेतृत्व में सर्वधर्म के लोगों ने पहाड़ी मंदिर के शिखर पर तिरंगा फहरा दिया था। हाथ से बुने और प्राकृतिक रंगों से रंगे इस तिरंगे के फहराते ही पूरा शहर ढोल-नगाड़ों और देश भक्ति के नारों से गूंज उठा। लोग रातभर पहाड़ी पर आजादी के जश्न में डूबे रहे। तब से आज तक हर साल 15 अगस्त और 26 जनवरी को यहां तिरंगा फहराने की अटूट परंपरा जारी है।

हिमालय से भी पुरानी चट्टानों पर स्थापित है यह धाम

रांची विश्वविद्यालय के भूगर्भवेत्ता डॉ. नीतीश प्रियदर्शी के अनुसार, रांची पहाड़ी की उत्पत्ति लगभग 650 से 900 मिलियन वर्ष पहले हुई थी। भूवैज्ञानिक दृष्टि से यह पहाड़ी हिमालय से भी करोड़ों वर्ष पुरानी है। यहां पाई जाने वाली ‘खोंडालाइट’ चट्टानें इसकी प्राचीनता को प्रमाणित करती हैं।

कभी ‘फांसी टुंगरी’ कहलाता था पहाड़ी मंदिर

ब्रिटिश शासनकाल में इस पहाड़ी को ‘फांसी टुंगरी’ या ‘हैंगिंग हिल’ कहा जाता था। अंग्रेज शासक 1857 के आंदोलन के दौरान देशप्रेमी स्वतंत्रता सेनानियों को सजा-ए-मौत देने के लिए इसी पहाड़ी के शिखर का इस्तेमाल करते थे। माना जाता है कि यहाँ 250 से अधिक अमर शहीदों ने देश के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। आज भी मंदिर की दीवारों पर कई शहीदों के नाम अंकित हैं, जिन्हें नमन करने दूर-दूर से श्रद्धालु पहुँचते हैं।

पालकोट के राजा से ब्रिटिश काल तक का सफर

वर्ष 1908 तक यह पहाड़ी पालकोट के राजा की निजी संपत्ति हुआ करती थी। बाद में ब्रिटिश कमिश्नर पी. थॉमसन की पहल पर रांची नगर पालिका ने इसे महज ₹11 में खरीदा और 1910-11 में इसे ‘पालकोट पार्क’ नाम दिया गया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अंग्रेजों ने इस पहाड़ी की चोटी पर एंटी-एयरक्राफ्ट मशीनगन भी लगाई थी। आज रांची रेलवे स्टेशन से करीब 7 किलोमीटर दूर स्थित यह पहाड़ी मंदिर शिव भक्तों के साथ-साथ हर राष्ट्रप्रेमी के लिए आस्था, त्याग और स्वतंत्रता के अनूठे संगम का केंद्र बना हुआ है।

Read More : दिल्ली में स्वतंत्रता दिवस से पहले बम से उड़ाने की धमकी, HC समेत छह जगह ईमेल से हड़कंप

WhatsApp Group जुड़ने के लिए क्लिक करें 👉 Join Now
Facebook
X
Threads
WhatsApp
Telegram
संबंधित खबरें.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *