मुंगेर: जलवायु परिवर्तन, अनियमित बारिश, गिरते भूजल स्तर और तेजी से सूखते पारंपरिक जलस्रोतों के बीच जल संरक्षण आने वाले समय की बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। ऐसे समय में मुंगेर के किशोर जायसवाल पिछले तीन दशकों से जल संरक्षण और ग्रामीण विकास के क्षेत्र में लगातार काम कर रहे हैं। वर्ष 2025 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हाथों राष्ट्रीय जल पुरस्कार से सम्मानित किशोर जायसवाल ने आईएएनएस से बातचीत में कहा कि पानी को केवल एक प्राकृतिक संसाधन के रूप में नहीं देखना चाहिए। यह खेती, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आने वाली पीढ़ियों के जीवन की बुनियाद है।
बारिश से आगे जल संरक्षण की सोच
किशोर जायसवाल के मुताबिक, जल संकट का कारण सिर्फ बारिश की कमी नहीं है। चुनौती यह समझने की भी है कि बारिश का पानी कहां गिरता है, कितना पानी बहकर निकल जाता है, अपने साथ कितनी मिट्टी ले जाता है और कितना हिस्सा जमीन के भीतर पहुंचता है। इसी सोच के साथ उन्होंने जलग्रहण विकास, भूजल पुनर्भरण और टिकाऊ कृषि को अपने सार्वजनिक जीवन के काम का आधार बनाया। सोसायटी फॉर वाटरशेड एंड रूरल डेवलपमेंट के माध्यम से उन्होंने जल संरक्षण को चेक डैम, खेत-तालाब, कुएं और मेड़बंदी जैसी संरचनाओं तक सीमित नहीं रखा। उनका जोर ग्रामीण समुदाय की भागीदारी पर रहा है। उनका मानना है कि योजनाओं के निर्माण से लेकर श्रमदान और संरचनाओं के रखरखाव तक ग्रामीणों की भागीदारी सुनिश्चित होने पर ही जल संरक्षण स्थायी बन सकता है।
105 से अधिक परियोजनाओं से 600 गांव जुड़े
किशोर जायसवाल के प्रयासों से 105 से अधिक जलग्रहण परियोजनाओं और पहलों के जरिए करीब 600 गांवों तक पहुंच बनी है। सरकारी योजनाओं, नाबार्ड, पंचायतों, तकनीकी संस्थानों, गैर-सरकारी संगठनों और ग्रामीण समुदाय को एक साझा जल-दृष्टि से जोड़ना उनके काम की प्रमुख विशेषता रही है। वह ग्राम पंचायतों को स्थानीय स्तर पर जल सुरक्षा की इकाई के रूप में मजबूत करने और मनरेगा जैसी योजनाओं को जल संरक्षण से जोड़ने की वकालत करते हैं। साथ ही, पारंपरिक जल ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच बेहतर तालमेल को भी जरूरी मानते हैं। उनके मुताबिक, पूर्वी भारत की आहर-पईन जैसी पारंपरिक प्रणालियों को हाइड्रोलॉजी, रिमोट सेंसिंग, भौगोलिक सूचना प्रणाली, मौसम के आंकड़ों, मृदा परीक्षण और सूक्ष्म सिंचाई जैसी आधुनिक तकनीकों से जोड़ा जाना चाहिए।
गांवों में जल बजट को विकास योजना से जोड़ने पर जोर
बदलती जलवायु के बीच किशोर जायसवाल जल संचयन से आगे बढ़कर ‘जल बजट’ को गांवों की विकास योजना का हिस्सा बनाने पर जोर देते हैं। उनका कहना है कि प्रत्येक गांव को यह पता होना चाहिए कि उसके पास कितना पानी उपलब्ध है और अलग-अलग फसलों के लिए कितने पानी की आवश्यकता है। वह फसल विविधीकरण, बागवानी, मृदा स्वास्थ्य और संतुलित सिंचाई को भी जल सुरक्षा से जोड़कर देखते हैं। बांका के उल्ही नाला जलग्रहण क्षेत्र के साथ मुंगेर, जमुई और अन्य इलाकों में हुए कार्यों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि हर क्षेत्र की अपनी भौगोलिक और जल-विज्ञान संबंधी परिस्थितियां होती हैं। इसलिए हर जगह एक जैसी जल संरक्षण योजना लागू नहीं की जा सकती। नदी पुनर्जीवन के संदर्भ में उनका मानना है कि स्वस्थ नदी के लिए स्वस्थ जलग्रहण क्षेत्र जरूरी है।
अतुल्य गंगा जैसे प्रयासों से जुड़कर उन्होंने जलग्रहण, भूजल और नदी को एक ही जल-चक्र के हिस्से के रूप में देखने की जरूरत पर जोर दिया। मुंगेर के पोलो मैदान में स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान प्रभारी मंत्री संजय कुमार द्वारा सम्मानित किए जाने को भी वह जल संरक्षण के प्रति बढ़ते सामाजिक सम्मान के रूप में देखते हैं। किशोर जायसवाल का संदेश है कि एक बूंद पानी बचाना सिर्फ पानी बचाना नहीं है, बल्कि मिट्टी, फसल, किसान और गांव के भविष्य को सुरक्षित करना है। उनके मुताबिक, जल संरक्षण का लक्ष्य केवल संरचनाएं बनाना नहीं, बल्कि सामुदायिक स्वामित्व, वैज्ञानिक सोच और टिकाऊ जीवन-पद्धति को मजबूत करना भी है।








