रांची। प्रदेश कांग्रेस महासचिव आलोक कुमार दूबे ने खनिज कानून 2026 को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि यह कानून केवल झारखंड का नहीं, बल्कि देश के सभी खनिज संपदा वाले राज्यों के अधिकारों और आर्थिक स्वायत्तता से जुड़ा गंभीर विषय है। उन्होंने कहा कि ्छरत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, ओडिशा और पश्चिम बंगाल जैसे खनिज संपदा वाले राज्यों के हितों पर भी इस कानून के संभावित प्रभाव को गंभीरता से समझने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर राज्यों की कराधान शक्ति को सीमित करने वाला यह कानून केंद्र और राज्यों के बीच अधिकारों के संतुलन पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। संसद से विधेयक पारित होने के बाद झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन ने भी प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर राज्य की वित्तीय स्वायत्तता और संभावित राजस्व नुकसान को लेकर चिंता जताई है।
उन्होंने कहा, खनिज झारखंड की धरती से निकलता है, लेकिन उसका अधिकार धीरे-धीरे दिल्ली के हाथों में केंद्रित करने की कोशिश की जा रही है। यही चिंता छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, ओडिशा और पश्चिम बंगाल जैसे खनिज उत्पादक राज्यों के लिए भी है। यह सिर्फ रॉयल्टी या टैक्स का सवाल नहीं है, बल्कि संघीय ढांचे में राज्यों के अधिकार और उनकी आर्थिक आत्मनिर्भरता का सवाल है।
कहा कि केंद्र सरकार पिछले बारह वर्षों में लगातार ऐसे कानून और नीतियां लेकर आई है, जिनसे संबंधित वर्गों और हितधारकों को पर्याप्त रूप से विश्वास में नहीं लिया गया। उन्होंने कहा कि कृषि के तीन काले कानून इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं।* किसानों के लंबे और व्यापक आंदोलन के बाद केंद्र सरकार को आखिरकार तीनों कृषि कानून वापस लेने पड़े।
उन्होंने कहा कि जीएसटी से लेकर कृषि कानूनों और केंद्र की विभिन्न नीतियों तक समय-समय पर व्यापारियों, किसानों, मजदूरों, युवाओं और आम जनता की ओर से विरोध और आपत्तियां सामने आती रही हैं। उनका कहना था कि सरकार को कानून बनाने से पहले उस वर्ग, समुदाय और राज्य को विश्वास में लेना चाहिए, जिस पर उसका सीधा प्रभाव पड़ने वाला है।
किसी भी लोकतांत्रिक सरकार का काम कानून थोपना नहीं, बल्कि संवाद और सहमति के रास्ते पर चलना है। लेकिन केंद्र सरकार की कार्यशैली ऐसी बन गई है कि पहले कानून लाओ, विरोध होने दो और फिर राजनीतिक दबाव में सफाई देते रहो। कृषि कानूनों में भी यही हुआ था, उन्होंने कहा।
भाजपा विधायक दल के नेता बाबूलाल मरांडी द्वारा खनिज कानून के समर्थन में प्रेस कॉन्फ्रेंस किए जाने पर आलोक कुमार दूबे ने कहा कि बाबूलाल मरांडी केंद्र सरकार के बचाव में सफाई दे रहे हैं, जबकि उन्हें झारखंड के हित और राज्य के अधिकारों की आवाज उठानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि झारखंड की पहचान केवल खनिज संपदा से नहीं है, बल्कि जल, जंगल, जमीन और आदिवासी-मूलवासी समाज के अधिकारों से जुड़ी हुई है। राज्य की प्राकृतिक संपदा पर निर्णय लेते समय यहां के लोगों और राज्य सरकार को विश्वास में लेना जरूरी है।
आलोक दूबे ने कहा कि ओडिशा जैसे खनिज संपदा वाले राज्यों के अनुभव और हितों को भी इस बहस के केंद्र में रखा जाना चाहिए। वहीं छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश जैसे खनिज उत्पादक राज्यों में भी राज्य के राजस्व, खनिज नीति और प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार को लेकर उठने वाली चिंताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल सहित पूर्वी और मध्य भारत के खनिज पट्टी वाले राज्यों के लिए यह विषय आने वाले समय में और महत्वपूर्ण होने वाला है।
उन्होंने कहा कि यह लड़ाई किसी एक पार्टी की नहीं, राज्यों के अधिकार और संघीय ढांचे की लड़ाई है। आज अगर झारखंड के खनिज अधिकार कमजोर होते हैं तो कल दूसरे खनिज संपदा वाले राज्यों की बारी हो सकती है।
कहा कि इससे पहले भी आदिवासियों और राज्यों के अधिकारों से जुड़े कानूनों में संशोधन की कोशिशों का व्यापक विरोध हुआ है। उन्होंने कहा कि *आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन के अधिकारों को कमजोर करने वाली किसी भी कोशिश को कांग्रेस पार्टी स्वीकार नहीं करेगी।
उन्होंने बाबूलाल मरांडी से सवाल करते हुए कहा, आपको दिल्ली की सरकार का बचाव करना है या झारखंड की जनता और झारखंड के अधिकारों की रक्षा करनी है, यह आपको तय करना होगा। झारखंड की खनिज संपदा पर पहला सवाल झारखंड के लोगों के अधिकार का है, भाजपा की राजनीति का नहीं।
कहा कि कांग्रेस पार्टी झारखंड के जल, जंगल, जमीन, खनिज और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से हर स्तर पर संघर्ष करेगी। राज्यों की आर्थिक स्वायत्तता और संघीय ढांचे को कमजोर करने वाली किसी भी नीति का पुरजोर विरोध किया जाएगा।








