रांची। झारखंड हाईकोर्ट ने हजारीबाग जिले के केरेडारी प्रखंड स्थित पांडु गांव की जमीन से जुड़े दो मामलों में फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि लंबे समय से चली आ रही जमाबंदी को राजस्व अधिकारी प्रशासनिक आदेश के जरिए रद्द नहीं कर सकते हैं।
यदि राज्य सरकार को जमाबंदी या भूमि बंदोबस्ती पर संदेह है तो उसे अपने अधिकार, स्वामित्व और हित के निर्धारण के लिए सक्षम सिविल कोर्ट का दरवाजा खटखटाना होगा। हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति आनंद सेन की अदालत ने मोहम्मद जाहिद मियां और मोहम्मद शमीम मियां की याचिका पर यह फैसला सुनाया।
कोर्ट ने हजारीबाग डीसी द्वारा 23 अप्रैल 2017 को पारित जमाबंदी रद्द करने के आदेश को निरस्त कर दिया। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता अभिजीत कुमार सिंह एवं अधिवक्ता हर्ष चंद्र ने पक्ष रखा।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि संबंधित भूमि का बंदोबस्त तत्कालीन जमींदार द्वारा हुकुमनामा के माध्यम से किया गया था और वर्ष 1955 से उनके नाम पर जमाबंदी चल रही थी। वे लगातार सरकारी लगान भी जमा करते रहे। वर्ष 2013 में एनटीपीसी द्वारा भूमि अधिग्रहण के दौरान अपर समाहर्ता ने जांच के बाद उन्हें मुआवजा पाने का वैध दावेदार भी माना था।
बाद में अंचल अधिकारी ने रिपोर्ट देकर कहा कि रजिस्टर-दो में जमाबंदी खोलने के आदेश का उल्लेख नहीं है, भूमि रिटर्न दाखिल नहीं किया गया और याचिकाकर्ता कब्जे में नहीं पाए गए। इसी आधार पर उपायुक्त ने जमाबंदी को संदिग्ध बताते हुए रद्द कर दिया।
राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि कथित बंदोबस्ती संदिग्ध है, क्योंकि बंदोबस्ती के समय याचिकाकर्ताओं की उम्र महज चार-पांच वर्ष थी और जमाबंदी खोलने के आदेश का कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। इस पर कोर्ट ने कहा कि केवल रजिस्टर में आदेश का उल्लेख नहीं होने, भूमि रिटर्न नहीं मिलने या अन्य संदेहों के आधार पर करीब 60 वर्ष से चली आ रही जमाबंदी रद्द नहीं की जा सकती।
अदालत ने अपने पूर्व के निर्णय State of Jharkhand vs. Izhar Hussain का हवाला देते हुए दोहराया कि लंबे समय से चली आ रही जमाबंदी को समाप्त करने का अधिकार राजस्व अधिकारियों को नहीं है। इन टिप्पणियों के साथ कोर्ट ने उपायुक्त के दोनों आदेशों को रद्द करते हुए याचिकाएं स्वीकार कर लीं।
हालांकि कोर्ट ने राज्य सरकार को यह स्वतंत्रता दी कि यदि वह भूमि पर अपने अधिकार का दावा करना चाहती है तो सक्षम सिविल कोर्ट में वाद दायर कर सकती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सिविल कोर्ट के आदेश के बिना किसी भी लंबे समय से चली आ रही जमाबंदी को प्रशासनिक स्तर पर रद्द नहीं किया जा सकता।




