रांची : झारखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल मानसिक बीमारी का आरोप लगाकर तलाक नहीं लिया जा सकता। यदि पति या पत्नी अपने जीवनसाथी को मानसिक रूप से अस्वस्थ बताते हुए तलाक की मांग करते हैं, तो उन्हें आरोप के समर्थन में ठोस, विश्वसनीय और चिकित्सीय साक्ष्य पेश करने होंगे। जस्टिस एसएन प्रसाद और जस्टिस पीके श्रीवास्तव की अदालत ने पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में पति की अपील खारिज कर दी और फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। मामला गिरिडीह के एक दंपती से जुड़ा है। पत्नी ने पति के आरोपों को पूरी तरह गलत बताया। उनका कहना था कि वह पूरी तरह स्वस्थ हैं और दहेज में चारपहिया वाहन की मांग पूरी नहीं होने पर उन्हें प्रताड़ित किया गया।
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मानसिक बीमारी का कोई चिकित्सीय प्रमाण नहीं मिला
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि पति ने पत्नी की कथित मानसिक बीमारी के समर्थन में कोई चिकित्सीय दस्तावेज या अन्य ठोस साक्ष्य पेश नहीं किया। रिकॉर्ड में ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला, जिससे यह साबित हो सके कि पत्नी किसी असाध्य मानसिक बीमारी से पीड़ित थीं। अदालत ने कहा कि केवल मौखिक आरोप या परिवार के सदस्यों और अन्य गवाहों के बयान पर्याप्त साक्ष्य नहीं माने जा सकते। अदालत ने स्पष्ट किया कि मानसिक बीमारी के आधार पर तलाक की मांग करने वाले पक्ष को अपने दावे के समर्थन में विश्वसनीय और चिकित्सीय प्रमाण प्रस्तुत करना होगा।
क्रूरता का आरोप भी साबित नहीं कर सका पति
हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि पति पत्नी के खिलाफ क्रूरता का आरोप साबित नहीं कर सका। रिकॉर्ड में ऐसा कोई विश्वसनीय साक्ष्य नहीं मिला, जिससे यह साबित हो कि पत्नी के व्यवहार के कारण पति के लिए वैवाहिक जीवन जारी रखना असंभव हो गया था। अदालत ने पर्याप्त प्रमाण के अभाव में पति की अपील खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।




