रांची : भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता मृत्युंजय शर्मा ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की समीक्षा बैठक के बाद राज्य सरकार की कृषि तैयारियों पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री ने स्वयं स्वीकार किया है कि इस वर्ष झारखंड में सामान्य से कम वर्षा हो रही है और सूखे की आशंका के बीच अधिकारियों को योजनाएं बनाने तथा किसानों को समय पर बीज और खाद उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने पूछा कि खरीफ सीजन शुरू होने के बाद सरकार को अब इन निर्देशों की जरूरत क्यों पड़ी।
Read More : रांची में 65वीं राज्य स्तरीय सुब्रतो कप फुटबॉल के दूसरे दिन रोमांचक मुकाबले, कई टीमों को मिली जीत
मृत्युंजय शर्मा ने कहा कि यदि सरकार ने समय रहते तैयारी की होती तो किसानों को बीज और खाद के लिए भटकना नहीं पड़ता। उनका कहना है कि कृषि कार्य का महत्वपूर्ण समय निकलता जा रहा है, जबकि राज्य के कई हिस्सों से किसानों को बीज और उर्वरक नहीं मिलने की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं।
धान रोपाई के आंकड़ों का किया जिक्र
भाजपा प्रवक्ता ने कहा कि सरकार ने इस वर्ष 18 लाख हेक्टेयर में धान की खेती का लक्ष्य रखा है, लेकिन 15 जुलाई तक केवल 2.36 लाख हेक्टेयर यानी 13.14 प्रतिशत क्षेत्र में ही धान की बिजाई और रोपाई हो सकी है। उन्होंने कहा कि पलामू प्रमंडल के जिलों में स्थिति और भी चिंताजनक है, जहां न के बराबर बिजाई और रोपाई हुई है। उनके अनुसार यह केवल कम वर्षा का परिणाम नहीं, बल्कि समय पर बीज, खाद और अन्य आवश्यक संसाधन उपलब्ध नहीं कराने की भी विफलता है।
Read More : रांची में ‘एकल ऑन व्हील्स’ कंप्यूटर बस की शुरुआत, ग्रामीणों को मिलेगा निःशुल्क डिजिटल प्रशिक्षण
धान खरीद को लेकर भी सरकार पर साधा निशाना
मृत्युंजय शर्मा ने कहा कि हेमंत सरकार की किसान विरोधी कार्यशैली नई नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्ष 2025-26 के धान खरीद सत्र में सरकार ने 60 लाख क्विंटल धान खरीद का लक्ष्य रखा था, लेकिन खरीद अवधि समाप्त होने तक करीब 30 लाख क्विंटल यानी लगभग 50 प्रतिशत धान की ही खरीद हो सकी। उनका दावा है कि हजारों किसानों को अपनी उपज बेचने का अवसर नहीं मिला और कई किसानों को मजबूरी में कम कीमत पर धान बेचना पड़ा।
उन्होंने कहा कि यदि मुख्यमंत्री वास्तव में किसानों की चिंता करते हैं तो केवल समीक्षा बैठकें और निर्देश पर्याप्त नहीं हैं। सरकार को सभी जिलों में बीज और खाद की निर्बाध उपलब्धता सुनिश्चित करनी चाहिए, सूखे की स्थिति से निपटने के लिए प्रभावी कार्ययोजना लागू करनी चाहिए तथा किसानों को तकनीकी और आर्थिक सहायता उपलब्ध करानी चाहिए।




