नई दिल्ली: भारतीय जनता पार्टी के सांसद निशिकांत दुबे ने शनिवार को कांग्रेस पार्टी पर तीखा हमला किया। दुबे ने कहा कि नेहरू-गांधी परिवार ने हमेशा हिंदुओं को दूसरे दर्जे का नागरिक माना है। उनका मुख्य इशारा संसद के बाहर 1966 में हुए ‘गो-हत्या विरोधी आंदोलन’ की ओर था।
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उन्होंने कहा कि 7 नवंबर 1966 को, डॉ. अंबेडकर के नेतृत्व में तैयार संविधान के अनुच्छेद 48 के तहत गो-हत्या पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव था। इसी संदर्भ में, भारत के महान संत करपात्री जी महाराज ने फरवरी 1966 में भारतीय जनसंघ के सांसद रामेश्वरानंद जी के साथ प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मुलाकात की। मार्च 1966 में इन दोनों ने तत्कालीन गृह मंत्री गुलजारीलाल नंदा से भी मुलाकात की, लेकिन उस समय 1967 के चुनाव नजदीक आ रहे थे। कांग्रेस को ‘गौ माता’ के मुद्दे में हिंदू-मुस्लिम विभाजन दिखाई दिया, इसलिए इंदिरा जी ने इस प्रतिबंध को लागू करने से मना कर दिया।
बीजेपी सांसद के अनुसार, जब 6-7 नवंबर 1966 को स्वामी करपात्री जी महाराज के नेतृत्व में हजारों साधु दिल्ली की संसद मार्ग (पार्लियामेंट स्ट्रीट) पर इकट्ठा हुए, तो प्रशासन ने बल प्रयोग किया। उन्होंने कहा कि 6-7 नवंबर को स्वामी करपात्री जी महाराज ने हजारों साधुओं के साथ संसद मार्ग पर विरोध प्रदर्शन शुरू किया। इसका नतीजा यह हुआ कि इंदिरा जी ने निहत्थे साधुओं पर बेरहमी से गोली चलाने का आदेश दे दिया। सैकड़ों साधु मारे गए और उनके शवों को गायब कर दिया गया। दुबे ने आगे बताया कि इस घटना के कारण पूरे देश में भारी आक्रोश फैल गया और विरोध प्रदर्शन हुए।
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उन्होंने दावा किया कि इस आंदोलन को शांत करने के लिए इंदिरा गांधी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से समर्थन मांगा। राजनीतिक नुकसान से बचने के लिए प्रशासन ने तत्कालीन गृह मंत्री गुलजारीलाल नंदा को हटा दिया और तत्कालीन आरएसएस प्रमुख एमएस गोलवलकर के साथ मिलकर एक न्यायिक समिति का गठन किया।
उन्होंने बताया कि इस समिति के सदस्यों में गोलवलकर, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश अमल सरकार, पुरी के शंकराचार्य और अमूल डेयरी के वर्गीज कुरियन शामिल थे। अमल सरकार को समिति का नेतृत्व सौंपा गया था। पूरे देश में विरोध-प्रदर्शन और भूख हड़तालें फैल गईं। अराजकता के माहौल और हिंदू-विरोधी मानसिकता को दबाने के लिए इंदिरा गांधी ने सबसे पहले गृह मंत्री गुलजारीलाल नंदा को उनके पद से हटा दिया। फिर, गोहत्या पर प्रतिबंध और गोलीबारी में हुई मौतों के कारणों की जांच के लिए उन्होंने आरएसएस प्रमुख आदरणीय गोलवलकर जी के साथ मिलकर एक न्यायिक समिति का गठन किया। इसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश अमल सरकार जी को सौंपी गई।
इसके अलावा, भाजपा सांसद ने आरोप लगाया कि पैनल को जानबूझकर निष्प्रभावी बना दिया गया था और इसकी कोई बैठक नहीं हुई। न तो कोई कार्यालय स्थापित किया गया और न ही कोई रिपोर्ट तैयार की गई। उन्होंने कहा कि नेहरू-गांधी परिवार ने हमेशा हिंदुओं को दोयम दर्जे का नागरिक माना है और उन्हें प्रताड़ित करने का कोई मौका नहीं छोड़ा।
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