धनबाद: देशभर में दुर्गा पूजा की धूम है। अब बिहार और झारखंड के हर शहर-गांव में पंडालों का निर्माण शुरू हो चुका है। वहीं झरिया के राजागढ़ स्थित राज परिवार के कुल देवी मंदिर एक एैसा झारखंड के झरिया के राजागढ़ स्थित मां दुर्गा का मंदिर आस्था के साथ इतिहास और राजपरिवार की सदियों पुरानी परंपराओं का साक्षी है। बताया जाता है कि इस मंदिर की स्थापना वर्ष 1752 में झरिया के तत्कालीन राजा रहे संग्राम सिंह ने कराई थी। इस समय राजगढ़ मंदिर के पुजारी अजय बनर्जी बताते है कि मध्यप्रदेश के रीवा से राजा संग्राम सिंह अपने भाइयों के साथ राज्य विस्तार के लिए निकले थे।
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उसे समय झरिया क्षेत्र पर स्थानीय डोम राजा का शासन था। राजा डोम काफी बलशाली थे, और उनकी चर्चा मगध से लेकर मालवा तक होती थी। इसी बात की जानकारी रीवा के राजा संग्राम सिंह को होने पर उन्होंने झरिया को जीतने का मन बनाया और फिर सन 1752 में झरिया पर चढ़ाई कर दी। कई दिनों तक झरिया के चौथाई कुल्ही के मैदान में युद्ध चलता रहा। आखिरकार राजा संग्राम सिंह ने डोम राजा और उनके वंशजों को युद्ध में पराजित कर झरिया पर अपना अधिकार स्थापित किया था। मान्यता है कि युद्ध के दौरान राजा संग्राम सिंह की तलवार उनके हाथ से छूटने की एक चमत्कारिक घटना हुई। फिर राजा संग्राम सिंह को लगा कि अब उनकी मृत्यु डोम राजा के हाथों निश्चित है।
जब युद्ध के मैदान में माता का दिखा ‘चमत्कार’
उन्होंने मन ही मन मां दुर्गा का आह्वान किया और निहत्थे होते हुए भी युद्ध में डटे रहे और डोम राजा पर विजय हासिल किया। युद्ध जीतने के बाद उन्होंने शक्ति की देवी मां दुर्गा की आराधना की और राजागढ़ में मंदिर बनवाने का संकल्प लिया। स्थानीय मान्यता के अनुसार, मां दुर्गा की पूजा के लिए पुरुलिया से मिट्टी लाई गई थी। इसी मिट्टी से राजागढ़ में मां की प्रतिमा तैयार कर दुर्गोत्सव की शुरुआत की गई। पुरुलिया के माणिक मुखर्जी इस मंदिर के पहले पुजारी थे। जो बाद में राज पुरोहित बने । धीरे-धीरे यह मंदिर झरिया राजपरिवार की कुलदेवी के प्रमुख आस्था केंद्र के रूप में स्थापित हो गया।
राजा संग्राम सिंह की परंपरा को वंशजों ने बढ़ाया आगे
राजा संग्राम सिंह के बाद झरिया के राजा दुर्गा प्रसाद सिंह बने, उसके बाद राजा काली प्रसाद सिंह और राजा शिव प्रसाद सिंह ने झरिया की राजगद्दी को संभाला और मां दुर्गा के मंदिर और दुर्गा पूजा की परंपरा को आगे बढ़ाया। इस तरह राजपरिवार की कई पीढ़ियों ने पूजा की विरासत को संभाले रखा, जो आज भी कायम है। आज भी इस मंदिर में राजा शिव प्रसाद के वंशज वही 350 साल पुरानी परंपरा से पूजा अर्चना करते हैं।
आज भी राज परिवार पुश्तैनी हवेली से निकलता है पूजा करने
झरिया राजागढ़ की दुर्गापूजा की सबसे बड़ी खासियत इसकी पारंपरिक पूजा पद्धति है। राजपरिवार के सदस्य आज भी पुराने बंगला पंचांग के अनुसार ही पूजा और धार्मिक अनुष्ठान कराते हैं। खास बात यह कि राज परिवार के लोग आज भी अपनी पुश्तैनी हवेली से उसी ठाठ से पालकी पर सवार होकर निकलते हैं और मंदिर पहुंच कर पूजा अर्चना करते हैं, जैसे 350 साल पहले उनके पूर्वज करते थे। समय बदला, पीढ़ियां बदलीं, लेकिन पूजा की मूल परंपरा में आज तक कोई बदलाव नहीं आया। यही कारण है कि राजागढ़ की दुर्गापूजा को झरिया की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान से जोड़कर देखा जाता है।
350 साल पुराने पटरे पर बनती है प्रतिमा
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