रांची: राज्य में राज्य सूचना आयोग को कार्यशील बनाने एवं मुख्य सूचना आयुक्त नियुक्ति से जुड़े एक मामले में मंगलवार को झारखंड हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान महाधिवक्ता रोहितश्व रॉय ने कोर्ट को बताया कि मुख्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति के बारे में सरकार विचार विमर्श कर रही है। जिस पर कोर्ट ने निर्देश दिया कि सरकार शपथ पत्र दाखिल कर बताए कि कब तक मुख्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति की जाएगी।
कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 19 नवंबर निर्धारित की है. प्राथी की ओर से अधिवक्ता विकास कुमार ने पक्ष रखा. दरअसल, पिछली सुनवाई में महाधिवक्ता ने कोर्ट को बताया था कि वह मुख्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति के संदर्भ में सकारात्मक जवाब के साथ आएंगे। जबकि पूर्व की सुनवाई के दौरान झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सूचना आयोग को कार्यशील बनाने में हो रही देरी पर कड़ी टिप्पणी की थी। कोर्ट ने सरकार से कहा था, “मुख्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति नहीं होने के कारण आयोग अब भी पूर्णतया क्रियाशील नहीं है। आयोग में चार सूचना आयुक्त नियुक्त हो चुके हैं और वेतन भी ले रहे हैं, लेकिन आयोग के निष्क्रिय होने से उनके पास कोई काम नहीं है।
कोर्ट ने याद दिलाया था कि राज्य के मुख्य सचिव 29 जनवरी और 20 अगस्त 2026 के आदेशों में दर्ज अपने शपथपूर्वक वचन में आयोग को क्रियाशील करने का भरोसा दे चुके हैं, पर वह अब तक पूरा नहीं हुआ। खंडपीठ ने यह भी कहा था कि अदालत में दिया गया वचन निभाना अनिवार्य है और उसका पालन न करना कोर्ट के आदेश की अवहेलना माना जा सकता है। तब महाधिवक्ता ने कहा था कि मुख्य सूचना आयुक्त का पद भरने का मामला “सक्रिय विचाराधीन” है और उन्होंने समय मांगा था। कोर्ट ने कहा था कि सरकार को पहले ही काफी रियायत मिल चुकी है, फिर भी एक और अवसर दिया जा रहा है।
आरटीआई के तहत मांगी थी जानकारी
दरअसल , प्रार्थी वीरेंद्र सिंह ने आरटीआई के तहत जानकारी मांगी थी। 30 दिन की तय अवधि में सूचना नहीं मिली, तो उन्होंने धारा 19(1) के तहत प्रथम अपील दायर की, लेकिन तब भी जानकारी नहीं दी गई। अगला कदम धारा 19(3) के तहत राज्य सूचना आयोग में द्वितीय अपील करना था, पर आयोग में अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति न होने से वह काम ही नहीं कर रहा।
मजबूर होकर आवेदक ने अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की। एकल पीठ ने प्रार्थी की याचिका खारिज करते हुए उन्हें आरटीआई कानून के तहत उपलब्ध उपाय अपनाने की छूट दी। आवेदक ने दलील दी कि आयोग निष्क्रिय है, इसलिए यह उपाय उनके लिए बेमानी है, और इसी आधार पर उन्होंने अपील दायर की।



