नई दिल्ली : आधुनिक जीवन की आपाधापी, कार्यस्थल का तनाव, कड़ी प्रतिस्पर्धा और बढ़ती अपेक्षाओं के बीच गुस्सा (क्रोध) मानव स्वभाव की एक आम लेकिन हानिकारक समस्या बन चुका है। छोटी-छोटी बातों पर अचानक गुस्सा आना न केवल व्यक्तिगत व पारिवारिक संबंधों को प्रभावित करता है, बल्कि व्यक्ति की निर्णय लेने की क्षमता और व्यवहार को भी पूरी तरह बिगाड़ सकता है। ऐसे समय में भारतीय दर्शन के सबसे महान ग्रंथ श्रीमद्भगवद्गीता में मन, इंद्रियों और भावनाओं को नियंत्रित करने के अत्यंत व्यावहारिक संदेश मिलते हैं।
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कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जीवन, कर्म और मानसिक स्थिति के जो उपदेश दिए थे, उनमें क्रोध उत्पन्न होने के मूल कारण और उसके विनाशकारी परिणामों का बहुत स्पष्ट वर्णन किया गया है। धार्मिक व दार्शनिक मान्यताओं के अनुसार, गीता केवल एक आध्यात्मिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि जीवन के हर मानसिक तनाव और संघर्ष को सुलझाने की एक सर्वकालिक मार्गदर्शिका है।
1. इच्छा और अत्यधिक आसक्ति ही है क्रोध की जड़
भगवद्गीता के दूसरे अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण मनुष्य के मन के मनोविज्ञान को समझाते हुए बताते हैं कि जब कोई व्यक्ति विषयों और भौतिक इच्छाओं के बारे में लगातार सोचता है, तो उसके भीतर उन वस्तुओं के प्रति गहरा लगाव (आसक्ति) पैदा हो जाता है। जब इस इच्छा की पूर्ति में कोई बाधा आती है, तो वहीं से क्रोध का जन्म होता है।
गीता का प्रसिद्ध श्लोक है :
ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते।
संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥
भावार्थ : विषयों के बारे में निरंतर चिंतन करने से मनुष्य में उनके प्रति आसक्ति उत्पन्न होती है। आसक्ति से इच्छा (कामना) पैदा होती है और इच्छा में बाधा पड़ते ही क्रोध भड़क उठता है। सीख : केवल प्रकट हुए गुस्से को दबाने की कोशिश करने के बजाय, व्यक्ति को अपनी अत्यधिक अपेक्षाओं और आसक्ति को समझना और नियंत्रित करना चाहिए।
2. क्रोध कैसे नष्ट करता है इंसान का विवेक और स्मृति?
श्रीकृष्ण आगे बताते हैं कि जब व्यक्ति क्रोधित होता है, तो उसकी सही-गलत सोचने की क्षमता खत्म हो जाती है। यह पूरी प्रक्रिया व्यक्ति के पतन का कारण बनती है:
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥
भावार्थ : क्रोध से व्यक्ति के भीतर मोह (भ्रम) पैदा होता है। भ्रमित होने से उसकी स्मृति (याददाश्त और सीख) कमजोर पड़ जाती है। स्मृति के बिगड़ने से बुद्धि (विवेक) नष्ट हो जाती है और जब बुद्धि नष्ट हो जाती है, तो मनुष्य का पतन (विनाश) हो जाता है। सीख : गुस्से के क्षणों में लिया गया कोई भी निर्णय अक्सर गलत साबित होता है, क्योंकि उस समय बुद्धि काम करना बंद कर देती है।
3. निष्काम कर्म और मन-इंद्रियों पर नियंत्रण का संदेश
गीता का मुख्य सिद्धांत ‘निष्काम कर्म’ है – अर्थात अपने कर्तव्यों का पूरी निष्ठा से पालन करना और परिणाम की अत्यधिक चिंता या मोह न रखना। अक्सर जब परिस्थितियाँ या परिणाम हमारी अपेक्षा के अनुसार नहीं होते, तो मन में निराशा और गुस्सा भर जाता है। परिणाम के प्रति अत्यधिक आसक्ति छोड़कर केवल अपने कर्म पर ध्यान केंद्रित करना मन की शांति बनाए रखने का सबसे बड़ा उपाय है। जब मन शांत रहता है, तो व्यक्ति कठिन से कठिन परिस्थिति का मुकाबला धैर्यपूर्वक कर पाता है।
4. व्यावहारिक जीवन में कैसे अपनाएं गीता के ये उपदेश?
प्रतिक्रिया देने में जल्दबाजी न करें : जब भी तेज गुस्सा आए, तो तुरंत जवाब देने या फैसला लेने के बजाय कुछ देर रुकें।
मौन और गहरी सांसें लें : क्रोध के समय वाणी पर नियंत्रण खो जाता है। ऐसे समय में कुछ क्षण मौन रहना, गहरी सांसें लेना या उस स्थान से थोड़ी देर के लिए अलग हो जाना बहुत फायदेमंद होता है।
स्वीकार्यता का भाव विकसित करें : जीवन में हर स्थिति हमारे नियंत्रण में नहीं हो सकती। हर परिस्थिति को खुद के हिसाब से चलाने की कोशिश छोड़ने से मन का तनाव कम होता है।
श्रीमद्भगवद्गीता का सार यही है कि क्रोध को जबरन दबाने के बजाय उसके कारणों (इच्छा और आसक्ति) को पहचानें। आज के तनावपूर्ण दौर में गीता के ये कालातीत उपदेश व्यक्ति को मानसिक संतुलन, धैर्य और आत्मनियंत्रण के साथ जीने की राह दिखाते हैं।
Disclaimer : यह जानकारी श्रीमद्भगवद्गीता की धार्मिक एवं दार्शनिक शिक्षाओं पर आधारित है। इसे किसी भी प्रकार की मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चिकित्सकीय या मनोवैज्ञानिक सलाह का विकल्प न माना जाए।




