कैंसर की दवाओं के दाम पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र से पूछा- इतना अंतर क्यों?

नई दिल्ली : कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का इलाज कराने में मरीज पहले ही आर्थिक रूप से टूट जाता है। ऊपर से दवाओं और अस्पताल में इस्तेमाल होने वाले सामान की कीमतों में भारी अंतर उसकी परेशानी और बढ़ा देता है। इसी मुद्दे पर सुप्रीम

सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट

अपनी भाषा में पढ़ें

नई दिल्ली : कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का इलाज कराने में मरीज पहले ही आर्थिक रूप से टूट जाता है। ऊपर से दवाओं और अस्पताल में इस्तेमाल होने वाले सामान की कीमतों में भारी अंतर उसकी परेशानी और बढ़ा देता है। इसी मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कड़े सवाल किए हैं। अदालत ने पूछा कि जब कीमोथेरेपी में इस्तेमाल होने वाला एक इंजेक्शन मेडिकल डिस्ट्रीब्यूटर को करीब 11 हजार रुपये में मिल सकता है, तो अस्पताल उसी के लिए 1.30 लाख रुपये कैसे मांग सकता है?

Read More : अभिषेक-वैभव की आंधी में उड़ा न्यूजीलैंड!, भारत सीरीज में 3-0 से आगे

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि मरीजों के पास दवा की कीमत को लेकर मोलभाव करने का कोई खास विकल्प नहीं होता। ऐसे में सरकार को बताना चाहिए कि कीमतों में इतना बड़ा अंतर क्यों है और आखिर यह पैसा कहां जा रहा है। अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि क्या अस्पतालों को मरीजों पर इस तरह की शर्तें थोपने का अधिकार है।

11 हजार के इंजेक्शन के लिए 1.30 लाख रुपये की मांग

सुनवाई के दौरान एक मेडिकल डिस्ट्रीब्यूटर की पत्नी के इलाज का उदाहरण सामने आया। महिला कैंसर से पीड़ित थीं और एक बड़े निजी अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था। उन्हें कीमोथेरेपी में इस्तेमाल होने वाला इंजेक्शन लगाया जाना था। बताया गया कि डिस्ट्रीब्यूटर ने अस्पताल को जानकारी दी कि वह खुद दवाओं का कारोबार करते हैं और इंजेक्शन उन्हें करीब 11 हजार रुपये में मिल जाता है। इसके बावजूद अस्पताल ने बाहर से लाए गए इंजेक्शन को लगाने से इनकार कर दिया और उसी दवा के लिए 1.30 लाख रुपये देने की बात कही।

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया कि इतनी बड़ी कीमत का क्या आधार है? अदालत ने यह भी पूछा कि क्या अस्पताल मरीजों को अपनी ही फार्मेसी से दवा खरीदने के लिए मजबूर कर सकते हैं।

15 रुपये की ड्रिप 250 रुपये में क्यों?

अदालत ने केवल कैंसर की दवाओं पर ही नहीं, बल्कि रोजाना इस्तेमाल होने वाले मेडिकल सामान की कीमतों पर भी सवाल उठाए। सुनवाई के दौरान ड्रिप लाइन का उदाहरण दिया गया। बताया गया कि जिस सामान की खुदरा कीमत करीब 15 रुपये है, उसके लिए 250 रुपये तक वसूले जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि जब दवाओं और मेडिकल सामान की कीमतों में इतना अंतर है, तो ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (DPCO) का फायदा मरीजों तक क्यों नहीं पहुंच रहा? अदालत ने कहा कि सरकार को इस व्यवस्था के पीछे का तर्क बताना होगा।

अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि अगर दवा की कीमतों पर नियंत्रण की व्यवस्था है, तो फिर इतनी बड़ी कीमतों का अंतर कैसे बना हुआ है। कोर्ट ने कहा कि मरीजों की जान और इलाज का मामला है, इसे केवल कारोबार और आर्थिक नीति के नजरिये से नहीं देखा जा सकता।

90 फीसदी दवाओं पर नियंत्रण नहीं होने का मुद्दा उठा

सुनवाई में दवाओं की कीमत तय करने की मौजूदा व्यवस्था पर भी चर्चा हुई। अदालत ने कहा कि बड़ी संख्या में दवाएं सीधे कीमत नियंत्रण के दायरे में नहीं आतीं। इसी वजह से गैर-अनुसूचित दवाओं की शुरुआती कीमत तय करने में कंपनियों को ज्यादा छूट मिलती है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा कि दवा कंपनियों के मुनाफे और मरीजों की जेब के बीच संतुलन बनाने के लिए क्या किया जा रहा है। अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि दवाओं की कीमतों में भारी अंतर होने के बावजूद कंपनियों से जुड़ी हजारों करोड़ रुपये की वसूली का मुद्दा अब तक क्यों बना हुआ है।

कोर्ट ने आयुष्मान भारत जैसी सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं का भी जिक्र किया। अदालत की चिंता थी कि जब इलाज का खर्च सरकारी योजनाओं के जरिए चुकाया जाता है, तो बढ़ी हुई कीमतों का बोझ आखिरकार सरकारी खजाने और मरीजों पर ही पड़ता है।

केंद्र ने कहा- कीमतों में संतुलन बनाने की कोशिश

केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कहा कि सरकार दवाओं की कीमतों को लेकर लगातार सुधार कर रही है। सरकार को मरीजों के हितों के साथ दवाओं की उपलब्धता और बाजार की जरूरतों का भी ध्यान रखना पड़ता है। लेकिन अदालत सरकार के जवाब से संतुष्ट नजर नहीं आई। कोर्ट ने कहा कि 11 हजार रुपये की दवा के लिए 1.30 लाख रुपये मांगने को केवल संतुलन बनाने की कोशिश नहीं कहा जा सकता। अदालत ने सरकार से कीमतों में इतने बड़े अंतर का ठोस कारण बताने को कहा।

केंद्र ने पहले अदालत को बताया था कि कुछ कैंसर की दवाओं पर ट्रेड मार्जिन 30 फीसदी तक सीमित करने का फैसला किया गया है। हालांकि, सुनवाई में अदालत ने सवाल उठाया कि जब समस्या दूसरी दवाओं और मेडिकल सामान में भी है, तो नियंत्रण केवल कैंसर की दवाओं तक ही क्यों सीमित रखा जाए।

निजी अस्पतालों ने भी रखी अपनी दलील

निजी अस्पतालों की ओर से वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर काफी बोझ है और निजी अस्पतालों को भी अपने ढांचे, कर्मचारियों और चौबीसों घंटे मिलने वाली सुविधाओं पर खर्च करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि मरीजों की सुरक्षा और इलाज की व्यवस्था बनाए रखने के लिए अस्पतालों को लगातार खर्च उठाना पड़ता है। इस पर अदालत ने सवाल किया कि अस्पतालों के संचालन का खर्च अपनी जगह है, लेकिन दवाओं की कीमत कई गुना बढ़ाने का क्या औचित्य है? कोर्ट ने कहा कि केवल निजी अस्पताल चलाने का तर्क देकर दवाओं की कीमतों में भारी अंतर को सही नहीं ठहराया जा सकता।

अदालत ने दवा की अधिकतम खुदरा कीमत (MRP) और खुदरा विक्रेता को मिलने वाली कीमत (PTR) के बीच के अंतर पर भी सवाल उठाए। कोर्ट जानना चाहता है कि अगर किसी दवा की खरीद कीमत काफी कम है, तो पैकेट पर कई गुना ज्यादा MRP लिखने की जरूरत क्यों पड़ती है।

पहले भी दवाओं की कीमतों पर सवाल उठा चुका है कोर्ट

इससे पहले की सुनवाई में भी सुप्रीम कोर्ट ने दवाओं की कीमतों में भारी अंतर पर चिंता जताई थी। अदालत ने उदाहरण दिया था कि करीब 27 हजार रुपये MRP वाली कैंसर की एक दवा खुदरा विक्रेता को लगभग 3 हजार रुपये में मिल रही थी। कोर्ट ने यह भी पूछा था कि सभी जरूरी दवाओं और मेडिकल सामान के लिए एक समान मार्जिन तय करने की संभावना पर विचार क्यों नहीं किया जा सकता। DPCO के तहत कुछ दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण है, जबकि कई गैर-अनुसूचित दवाओं की शुरुआती कीमतें कंपनियां तय करती हैं।

अदालत का मुख्य सवाल यही है कि इलाज की कीमतें तय करने वाली व्यवस्था में मरीजों के हितों को कैसे सुरक्षित किया जाए और दवाओं की कीमतों में मनमाना अंतर कैसे रोका जाए। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है।

WhatsApp Group जुड़ने के लिए क्लिक करें 👉 Join Now
Facebook
X
Threads
WhatsApp
Telegram
संबंधित खबरें.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *