पर्यूषण महापर्व का दूसरा दिन: माता देवकी के प्रसंग से मिली क्षमा की सीख

रांची : श्री साधुमार्गी जैन संघ की ओर से आयोजित पर्यूषण महापर्व के धार्मिक कार्यक्रम के दूसरे दिन में स्वाध्यायी जी ने ‘धर्म और जीवन जीने की कला’ विषय पर प्रेरणादायी प्रवचन दिया। उन्होंने कहा कि संतों का दर्शन, उनकी वाणी का श्रवण और उनके

पर्यूषण महापर्व
धर्म और जीवन जीने की कला पर प्रेरक प्रवचन।

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रांची : श्री साधुमार्गी जैन संघ की ओर से आयोजित पर्यूषण महापर्व के धार्मिक कार्यक्रम के दूसरे दिन में स्वाध्यायी जी ने ‘धर्म और जीवन जीने की कला’ विषय पर प्रेरणादायी प्रवचन दिया। उन्होंने कहा कि संतों का दर्शन, उनकी वाणी का श्रवण और उनके बताए छोटे-छोटे व्रत व नियम भी व्यक्ति के जीवन को सकारात्मक दिशा दे सकते हैं। उन्होंने कहा कि धर्म का उद्देश्य केवल धार्मिक क्रियाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि व्यक्ति के जीवन और मन में सकारात्मक बदलाव लाना है। प्रत्याख्यान, व्रत या नियम लेने के साथ उसे पूरा करने का दृढ़ संकल्प भी होना चाहिए।

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माता देवकी के प्रसंग से क्षमा की सीख

अंतःगड़ सूत्र के वाचन के दौरान स्वाध्यायी जी ने माता देवकी के जीवन से जुड़े मार्मिक प्रसंग का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि जब माता देवकी के छह पुत्रों की मृत्यु हुई, तब उनके मन में यह भाव नहीं आया कि उनके बच्चों के साथ ऐसा क्यों हुआ। इसके बजाय उनके मन में यह विचार आया कि अच्छा हुआ, उनके भाई कंस को उनके बच्चों को मारने का पाप नहीं करना पड़ा। अपने बच्चों को खोने के असहनीय दुःख के बावजूद माता देवकी के मन में भाई के प्रति दुर्भावना नहीं आई। यह प्रसंग क्षमा, करुणा और निर्मल भावनाओं की प्रेरणा देता है।

साधना और वात्सल्य का प्रसंग

स्वाध्यायी जी ने बताया कि माता देवकी के छह पुत्रों का पालन-पोषण सुरसा के यहां हुआ। बड़े होने के बाद उन्होंने भगवान अरिष्टनेमी से दीक्षा ग्रहण की और बेले-बेले की तपस्या करते हुए साधना के मार्ग पर आगे बढ़े। एक बार द्वारका नगरी में विहार करते हुए वे माता देवकी के महल पहुंचे और भिक्षा की मांग की। भगवान अरिष्टनेमी ने जब माता देवकी को बताया कि ये साधु उनके ही पुत्र हैं, तो माता की ममता उमड़ पड़ी और उनके भीतर वात्सल्य का भाव जाग उठा।

वचन और संकल्प के प्रति दृढ़ रहने का संदेश

स्वाध्यायी जी ने कहा कि छोटे-छोटे नियमों का दृढ़ता से पालन भी व्यक्ति के जीवन में बड़ा परिवर्तन ला सकता है। उन्होंने भगवान राम के जीवन का उदाहरण देते हुए कहा कि अपने वचन को पूरा करने के लिए उन्होंने 14 वर्ष का वनवास स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि इससे व्यक्ति को अपने संकल्प और वचन के प्रति दृढ़ रहने की प्रेरणा मिलती है। जीवन में हमेशा यह भाव रखना चाहिए कि “जो होता है, अच्छे के लिए होता है।” विपरीत परिस्थितियों में भी सकारात्मक दृष्टिकोण बनाए रखना जीवन को सुखी और सार्थक बनाता है। कार्यक्रम के दौरान स्वाध्यायी ने ‘रामामृतम’ ध्यान भी कराया। इसमें उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं ने सहभागिता की।

राजस्थान के पूर्व मंत्री ने लिया गुरु दर्शन

कार्यक्रम का मंच संचालन राजेश पींचा ने किया। इस अवसर पर मूल चंद सुराणा, हुक्मी चंद चोरड़िया, उत्तम कोठारी, सुमन बच्छावत, तेरापंथ सभा रांची के अध्यक्ष अमर चंद बैगानी और मंत्री विनोद बेगवानी सहित 100 से अधिक श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे। वहीं, राजस्थान सरकार के पूर्व कैबिनेट मंत्री डॉ. बी. डी. कल्ला और तिलोकि कल्ला ने गुरु दर्शन सेवा का लाभ लिया। उन्होंने विभिन्न विषयों पर मार्गदर्शन प्राप्त किया। साधुमार्गी जैन सेवा समिति बीकानेर की ओर से साहित्य भेंटकर उनका सम्मान किया गया।

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