रांची : संसद के दोनों सदनों से पारित MMDR संशोधन विधेयक 2026 को विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताते हुए वरिष्ठ पत्रकार एवं झारखंड भाजपा के पूर्व मीडिया प्रभारी सांवर मल अग्रवाल ने कहा है कि इस संशोधन से राज्यों के संवैधानिक अधिकार समाप्त नहीं होंगे। उनके अनुसार, विधेयक का उद्देश्य खनिज क्षेत्र में स्थिरता लाना, उद्योगों को बढ़ावा देना, खनिजों की उपलब्धता आसान करना और निवेश के नए अवसर पैदा करना है। अग्रवाल के मुताबिक, खनिज क्षेत्र में निवेश बढ़ने से रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे और युवाओं के लिए संभावनाएं बढ़ेंगी। उन्होंने कहा कि खनिज संपदा से समृद्ध राज्यों के लिए यह विधेयक आर्थिक गतिविधियों को गति देने में सहायक साबित हो सकता है।
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उन्होंने कहा कि कुछ राजनीतिक दलों और नेताओं की ओर से यह आरोप लगाया जा रहा है कि केंद्र सरकार इस संशोधन के माध्यम से राज्यों के खनिज राजस्व पर नियंत्रण करना चाहती है, लेकिन उपलब्ध आंकड़े इस दावे को सही नहीं ठहराते। उनके अनुसार, वित्तीय वर्ष 2025-26 में कोयला और गैर-कोयला खनिजों से राज्यों को 1,14,549 करोड़ रुपये की राशि प्राप्त हुई। इसमें राज्यों की हिस्सेदारी 88.53 प्रतिशत रही, जबकि केंद्र सरकार की हिस्सेदारी 11.47 प्रतिशत थी।
झारखंड में खदानों की नीलामी और संचालन पर उठाए सवाल
सांवर मल अग्रवाल ने झारखंड में खनिज संसाधनों के बावजूद खदानों के संचालन की धीमी गति पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि झारखंड खनिज संपदा से समृद्ध राज्य है, लेकिन सरकारी आंकड़ों के अनुसार पिछले 11 वर्षों में राज्य में केवल 11 खदानों की नीलामी हुई और इनमें से किसी भी खदान में अब तक परिचालन शुरू नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि जब राज्य के पास पर्याप्त खनिज संपदा और खदानों की नीलामी की व्यवस्था मौजूद है, तो नीलाम की गई खदानों में उत्पादन शुरू होने में देरी क्यों हो रही है, यह गंभीर सवाल है। अग्रवाल ने झारखंड की तुलना पड़ोसी राज्य ओडिशा से करते हुए कहा कि ओडिशा में 79 खदानों की नीलामी की गई, जिनमें से 75 खदानों में परिचालन शुरू हो चुका है। उनके अनुसार, ओडिशा खदानों का संचालन शुरू कर हजारों करोड़ रुपये का राजस्व जुटा सकता है, तो झारखंड में नीलाम की गई खदानों को उत्पादन में लाने में देरी का कारण सरकार को स्पष्ट करना चाहिए। उन्होंने कहा कि झारखंड के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी खनिज संपदा को उत्पादन, रोजगार और राजस्व में बदलने की है। इसके लिए राज्य सरकार को खनन क्षेत्र में प्रभावी व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता है।
केवल नए कर लगाना राजस्व बढ़ाने का रास्ता नहीं
अग्रवाल ने कहा कि राज्यों के राजस्व में वृद्धि के लिए केवल नए कर लगाना ही एकमात्र विकल्प नहीं है। अधिक खनन, अधिक उत्पादन, खदानों की नीलामी, प्रीमियम और रॉयल्टी के माध्यम से भी राज्य अपनी आय बढ़ा सकते हैं। उन्होंने कहा कि झारखंड में खनिज संपदा की कोई कमी नहीं है, लेकिन इस संपदा को उत्पादन और राजस्व में बदलना राज्य सरकार की प्रशासनिक व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती है। उनके अनुसार, आरोप-प्रत्यारोप से समस्या का समाधान नहीं होगा और सरकार को खनिज क्षेत्र की क्षमता का पूरा उपयोग करने पर ध्यान देना चाहिए।
राज्यों के संवैधानिक अधिकारों पर असर नहीं : अग्रवाल
MMDR संशोधन विधेयक को लेकर विपक्षी दलों की ओर से लगाए जा रहे आरोपों को खारिज करते हुए अग्रवाल ने कहा कि विधेयक राज्यों के भूमि और खनिज संपदा संबंधी अधिकार समाप्त नहीं करता है। उन्होंने कहा कि विधेयक में रॉयल्टी, DMF और NMET से राज्यों को मिलने वाले राजस्व प्रवाह को प्रभावित करने का प्रावधान नहीं है। उनके अनुसार, संशोधन का उद्देश्य खनिज क्षेत्र में लगाए जाने वाले अतिरिक्त शुल्कों को निर्धारित नियमों और सीमाओं के अनुरूप रखना है, ताकि पूरे देश में खनिज क्षेत्र में स्थिरता बनी रहे। उन्होंने कहा कि अत्यधिक शुल्क लगाने से खदानों में उत्पादन प्रभावित हो सकता है या उत्पादन बंद होने की स्थिति पैदा हो सकती है। इसका सीधा असर उद्योगों, रोजगार और आम लोगों पर पड़ सकता है।
DMF की राशि से आम लोगों को मिलना चाहिए लाभ
अग्रवाल ने खनिज संपदा से मिलने वाले राजस्व के उपयोग पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि झारखंड के 24 जिलों में लगभग 19 हजार करोड़ रुपये का DMF संग्रह प्राप्त हुआ है। इस राशि का उपयोग आम लोगों की सुविधाओं, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पेयजल और तालाब जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि विशेष रूप से आदिवासी गांवों तक विकास योजनाओं का लाभ पहुंचाने की आवश्यकता है। उनके अनुसार, MMDR संशोधन विधेयक से DMF की व्यवस्था पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।
खनिज क्षेत्र में निवेश और रोजगार बढ़ने की उम्मीद
सांवर मल अग्रवाल ने कहा कि संशोधन विधेयक में राज्य और राष्ट्रीय हितों के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया गया है। उनके अनुसार, राजस्व का बड़ा हिस्सा राज्यों के पास ही रहेगा और रॉयल्टी, DMF, NMET तथा GST में राज्यों की हिस्सेदारी जारी रहेगी। उन्होंने कहा कि खनिज क्षेत्र में स्थिर व्यवस्था बनने से निवेश बढ़ सकता है। निवेश और खनन गतिविधियों में वृद्धि होने पर रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। साथ ही खनिजों की लागत कम होने से स्टील, लोहा और कोयले जैसे क्षेत्रों में भी इसका प्रभाव देखने को मिल सकता है। अग्रवाल ने कहा कि यदि ओडिशा खदानों के संचालन के जरिए बड़ी मात्रा में राजस्व अर्जित कर सकता है, तो झारखंड में नीलाम की गई खदानें अब तक चालू क्यों नहीं हो पाई हैं, इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। उन्होंने राज्य सरकार से खनिज संपदा को उत्पादन, रोजगार और राजस्व में बदलने की दिशा में ठोस कदम उठाने की आवश्यकता बताई।






