रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने रामगढ़ जिले के गोला अंचल के डभातु गांव में भूमि अधिग्रहण और मुआवजा निर्धारण से जुड़े छह प्रथम अपील मामलों में निचली अदालत के फैसले को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने सभी मामलों को दोबारा निचली अदालत में भेजते हुए उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर मुआवजे का नए सिरे से निर्धारण करने का निर्देश दिया है।
हाईकोर्ट ने निचली अदालत को आदेश की प्रति प्राप्त होने की तारीख से चार महीने के भीतर मामलों का फैसला करने को कहा है। यह फैसला न्यायमूर्ति संजय प्रसाद की अदालत ने सुनाया।
9.27 एकड़ जमीन के अधिग्रहण से जुड़ा है मामला
पूरा मामला भैरवा जलाशय परियोजना के लिए डभातु गांव की करीब 9.27 एकड़ जमीन के अधिग्रहण से जुड़ा है। भूमि अधिग्रहण की घोषणा 20 नवंबर 2003 को की गई थी, जबकि इसका प्रकाशन 2 दिसंबर 2003 को जिला गजट में हुआ था।
अधिग्रहित जमीन के लिए कलेक्टर की ओर से मुआवजा निर्धारित किया गया था। जमीन मालिकों ने मुआवजे की राशि को अपर्याप्त बताते हुए भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा 18 के तहत आपत्ति दर्ज कराई थी।
जमीन मालिकों का दावा था कि उनकी जमीन की बाजार कीमत अधिक थी और मुआवजा तय करते समय जमीन की भविष्य की उपयोगिता, उपजाऊपन और व्यावसायिक संभावनाओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।
जमीन मालिकों ने बताया था- आसपास मौजूद हैं कई महत्वपूर्ण सुविधाएं
जमीन मालिकों की ओर से अदालत में दलील दी गई कि संबंधित जमीन गोला शहर से करीब एक किलोमीटर की दूरी पर है। इसके आसपास बाजार, रेलवे स्टेशन, अस्पताल, प्रखंड कार्यालय, पावर स्टेशन, राष्ट्रीय राजमार्ग समेत कई महत्वपूर्ण सुविधाएं मौजूद हैं।
उनका कहना था कि इन परिस्थितियों को देखते हुए जमीन का वास्तविक बाजार मूल्य निर्धारित मुआवजे से काफी अधिक था।
8,923 रुपये प्रति डिसमिल की दर से तय हुआ था मुआवजा
भूमि अधिग्रहण न्यायालय ने पूर्व के एक मामले के फैसले को आधार बनाते हुए संबंधित जमीन के लिए 8,923 रुपये प्रति डिसमिल की दर से मुआवजा निर्धारित किया था।
इसी फैसले को तत्कालीन हजारीबाग, अब रामगढ़, के उपायुक्त की ओर से हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी। राज्य सरकार का तर्क था कि निचली अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों का सही तरीके से मूल्यांकन नहीं किया।
सरकार ने यह भी दलील दी कि जमीन मालिक अधिग्रहण के समय प्रचलित बाजार दर को साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सके थे।
वहीं, जमीन मालिकों की ओर से आरोप लगाया गया कि सरकार ने वर्ष 2002 में हुए कई भूमि सौदों में अधिक कीमत वाले सौदों को नजरअंदाज कर कम कीमत वाले सौदों को आधार बनाया।
हाईकोर्ट ने साक्ष्यों के मूल्यांकन में पाई कमी
रिकॉर्ड की समीक्षा के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि निचली अदालत ने वर्ष 2002 में हुए 33 भूमि सौदों का उल्लेख तो किया था, लेकिन उनके मूल्य और जमीन के क्षेत्रफल का पर्याप्त विश्लेषण नहीं किया गया।
अदालत ने यह भी पाया कि राज्य सरकार की ओर से पेश किए गए महत्वपूर्ण दस्तावेजों, खासकर बिक्री चार्ट और वैल्यूएशन खतियान, पर निचली अदालत ने पर्याप्त विचार नहीं किया था।
इन्हीं कमियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने पुराने फैसले को बरकरार रखने के बजाय मामलों की दोबारा सुनवाई का निर्देश दिया।
पुराने दस्तावेजों की स्थिति पर भी कोर्ट ने जताई नाराजगी
हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान रिकॉर्ड में शामिल कुछ दस्तावेजों की पठनीयता पर भी टिप्पणी की। अदालत ने पाया कि एक्सहिबिट-सी के कई पन्ने इतने छोटे थे कि उन्हें पढ़ना मुश्किल था। वहीं एक्सहिबिट-डी भी स्पष्ट रूप से पठनीय नहीं था।
कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत के रिकॉर्ड भेजते समय संबंधित दस्तावेजों को उचित और स्पष्ट रूप में उपलब्ध कराया जाना चाहिए, ताकि मामले की प्रभावी न्यायिक समीक्षा हो सके।
2012 का फैसला और अवॉर्ड रद्द
हाईकोर्ट ने 29 फरवरी 2012 के फैसले और 15 मार्च 2012 को हस्ताक्षरित अवॉर्ड को रद्द कर दिया। इसके बाद सभी छह मामलों को उसी भूमि अधिग्रहण न्यायालय में वापस भेज दिया गया।
निचली अदालत को निर्देश दिया गया है कि वह उपलब्ध सभी साक्ष्यों और दस्तावेजों का उचित मूल्यांकन करते हुए मुआवजे की राशि का नए सिरे से निर्धारण करे।
कोर्ट ने चार महीने की समयसीमा तय करते हुए कहा है कि आदेश की प्रति प्राप्त होने की तारीख से निर्धारित अवधि के भीतर मामलों का फैसला किया जाए।
एक मामले में अपील आंशिक रूप से समाप्त
छह प्रथम अपीलों में से एक मामले में अपील आंशिक रूप से समाप्त मानी गई। इस मामले में एक प्रतिवादी की मृत्यु के बाद उसके संबंध में अपील 12 सितंबर 2022 के आदेश के तहत एबेट हो चुकी थी। साथ ही उसके कानूनी उत्तराधिकारियों को रिकॉर्ड पर लाने के लिए आवश्यक कदम नहीं उठाए गए थे।
अब छहों मामलों में हाईकोर्ट के आदेश के बाद मुआवजा निर्धारण की प्रक्रिया दोबारा निचली अदालत में होगी। इससे जमीन मालिकों को मिलने वाले मुआवजे की राशि पर एक बार फिर सुनवाई और निर्णय का रास्ता खुल गया है।





