JSSC-CGL परीक्षा रद्द करने पर हाईकोर्ट में सुनवाई पूरी, अब फैसले का इंतजार

रांची : विज्ञापन संख्या 10/2023 के तहत हुई JSSC-CGL नियुक्ति परीक्षा का परिणाम रद्द करने के राज्य सरकार के फैसले के खिलाफ दायर याचिकाओं पर झारखंड हाईकोर्ट में गुरुवार को सुनवाई पूरी हो गई। जस्टिस दीपक रौशन की अदालत में मामले से जुड़े सभी पक्षों

हाईकोर्ट
झारखंड हाईकोर्ट

अपनी भाषा में पढ़ें

Advertisement

रांची : विज्ञापन संख्या 10/2023 के तहत हुई JSSC-CGL नियुक्ति परीक्षा का परिणाम रद्द करने के राज्य सरकार के फैसले के खिलाफ दायर याचिकाओं पर झारखंड हाईकोर्ट में गुरुवार को सुनवाई पूरी हो गई। जस्टिस दीपक रौशन की अदालत में मामले से जुड़े सभी पक्षों ने अपनी-अपनी दलीलें रखीं। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने भी मामले को लेकर कई अहम सवाल किए। यह सुनवाई आकाश गौरव, निरोज खेस समेत अन्य अभ्यर्थियों की याचिकाओं पर हुई।

Read More : UP की 403 सीटों पर चिराग पासवान की तैयारी, NDA पर भी बोले

सरकार ने कहा- परीक्षा में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी हुई

राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सरकार का पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि JSSC-CGL परीक्षा रद्द करने की मुख्य वजह परीक्षा में बड़े पैमाने पर सामने आई अनियमितता और भ्रष्टाचार है। सरकार के मुताबिक, परीक्षा कराने की जिम्मेदारी जिस एजेंसी को दी गई थी, उसकी व्यवस्था में ही गंभीर खामियां थीं। सरकार का आरोप है कि इसी वजह से प्रश्नपत्र लीक हुआ। सरकार की ओर से कोर्ट को बताया गया कि एजेंसी के जरिए कुछ अभ्यर्थियों को प्रश्नों के उत्तर नेपाल और दूसरी जगहों पर ले जाकर रटवाए गए। सरकार का कहना था कि ऐसे हालात में परीक्षा की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए थे।

सरकार बोली- परीक्षा की निष्पक्षता पर भरोसा जरूरी

सरकार ने अदालत में दलील दी कि किसी भी प्रतियोगी परीक्षा की नियुक्ति प्रक्रिया में अभ्यर्थियों और आम लोगों का भरोसा बना रहना जरूरी है। सरकार के मुताबिक, जब परीक्षा की निष्पक्षता ही सवालों के घेरे में आ जाए तो पूरी परीक्षा रद्द करने के अलावा दूसरा रास्ता नहीं बचता। सरकार ने यह भी बताया कि मामले की जांच अभी चल रही है और अब तक की जांच में गड़बड़ी से जुड़े ठोस सबूत मिले हैं।

कौन दोषी और कौन निर्दोष, अलग करना मुश्किल- सरकार

सरकार की ओर से कहा गया कि जांच में मिले दस्तावेजों से परीक्षा में गड़बड़ी, अनियमितता और भ्रष्टाचार के स्पष्ट संकेत मिले हैं। ऐसे में यह पता लगाना बेहद मुश्किल है कि किस अभ्यर्थी को गड़बड़ी का फायदा मिला और कौन पूरी तरह निर्दोष था। इसी वजह से कैबिनेट ने प्रश्नपत्र लीक और परीक्षा में हुई अनियमितताओं को देखते हुए पूरी परीक्षा रद्द करने का फैसला लिया।

हाईकोर्ट ने जांच में देरी पर पूछे सवाल

सुनवाई के दौरान अदालत ने मामले की जांच को लेकर कई सवाल किए। कोर्ट ने पूछा कि करीब तीन साल बाद जांच की रफ्तार अचानक कैसे तेज हो गई। अदालत ने यह भी पूछा कि जब प्रश्नपत्र लीक होने की बात सामने आई थी, उसी समय FIR क्यों नहीं दर्ज की गई। कोर्ट ने जीरो FIR दर्ज करने की जरूरत क्यों नहीं समझी गई, इस पर भी सवाल किया। इन सवालों के जरिए अदालत ने पूरे मामले में सिस्टम की कार्यप्रणाली को लेकर भी सवाल उठाए।

हस्तक्षेपकर्ता ने कहा- पूरा मामला सिस्टम की विफलता

मामले में हस्तक्षेपकर्ता की ओर से अधिवक्ता हर्ष कुमार ने सरकार के परीक्षा रद्द करने के फैसले का समर्थन किया। उन्होंने इसे प्रशासनिक और व्यवस्थागत विफलता बताया। उनका आरोप था कि एक ब्लैकलिस्टेड एजेंसी को परीक्षा कराने की जिम्मेदारी दी गई और उसी एजेंसी की वजह से प्रश्नपत्र लीक हुआ। हस्तक्षेपकर्ता की ओर से कहा गया कि लीक हुआ प्रश्नपत्र बड़ी संख्या में अभ्यर्थियों तक पहुंचा। इसका सीधा असर उन योग्य और मेधावी अभ्यर्थियों पर पड़ा, जिन्होंने पूरी ईमानदारी से परीक्षा दी थी। दलील दी गई कि ऐसे हालात में परीक्षा परिणाम को बरकरार रखना ईमानदारी से परीक्षा देने वाले अभ्यर्थियों के साथ अन्याय होगा।

नौकरी कर रहे अभ्यर्थियों ने सरकार के फैसले का विरोध किया

दूसरी ओर, JSSC-CGL परीक्षा पास कर नौकरी कर रहे अभ्यर्थियों की ओर से अधिवक्ता अमृतांश वत्स ने सरकार के फैसले का विरोध किया। उन्होंने कोर्ट को बताया कि इन अभ्यर्थियों की नियुक्ति राज्यपाल के आदेश से हुई है। ऐसे में सरकार की ओर से परीक्षा और संबंधित विज्ञापन को रद्द करने का नोटिफिकेशन जारी करना उसके अधिकार क्षेत्र पर सवाल खड़ा करता है। अमृतांश वत्स ने दलील दी कि सरकार के पास इस तरह नियुक्ति प्रक्रिया को रद्द करने का अधिकार नहीं है। उनका कहना था कि यह अधिकार संबंधित आयोग के पास है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर नियुक्तियों से जुड़ा आदेश रद्द करना था तो राज्यपाल की सहमति से नियुक्ति संबंधी आदेश को रद्द करने की प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए थी।

सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का दिया हवाला

नौकरी कर रहे अभ्यर्थियों की ओर से अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेशों का भी हवाला दिया। दलील दी गई कि जब किसी परीक्षा को रद्द करने से बड़ी संख्या में लोगों की नौकरी प्रभावित होती है, तो ऐसे मामले में अदालत को बेहद सावधानी और बारीकी से पूरे मामले की जांच करनी चाहिए।

9 अक्टूबर को JPSC से जुड़े मामलों की सुनवाई

अब 9 अक्टूबर को सुबह 11 बजे झारखंड हाईकोर्ट में JPSC की ओर से आयोजित परीक्षाओं से जुड़े मामलों की सुनवाई होगी। इनमें CDPO, 11वीं से 13वीं सिविल सेवा परीक्षा, फूड सेफ्टी ऑफिसर समेत अन्य परीक्षाओं को रद्द करने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाएं शामिल हैं।

WhatsApp Group जुड़ने के लिए क्लिक करें 👉 Join Now
Facebook
X
Threads
WhatsApp
Telegram
संबंधित खबरें.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *