ग्रेट बैरियर रीफ पर जलवायु संकट का असर, वैज्ञानिकों ने खोजा नया तरीका

ऑस्ट्रेलियाई शोधकर्ताओं ने 30 साल से अधिक के डेटा से ऐसा फ्रेमवर्क तैयार किया है, जो कोरल रीफ की सेहत और गिरावट को मापने में मदद करेगा।

कैनबरा, ऑस्ट्रेलिया:ऑस्ट्रेलिया में शोधकर्ताओं ने ग्रेट बैरियर रीफ पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को बेहतर तरीके से समझने और मापने के लिए एक नया फ्रेमवर्क तैयार किया है। इसके लिए 30 साल से अधिक समय के डेटा का इस्तेमाल किया गया है। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह फ्रेमवर्क समय के साथ कोरल रीफ में होने वाले बदलावों का आकलन करने और उसकी ‘हेल्थ चेक’ करने में मदद करेगा। यूनिवर्सिटी ऑफ सिडनी (USYD) ने मंगलवार को जारी बयान में बताया कि इस फ्रेमवर्क के जरिए कोरल ब्लीचिंग, चक्रवात और बाढ़ जैसी गंभीर घटनाओं के बाद रीफ पर पड़ने वाले प्रभावों को मापा जा सकता है।

30 साल के डेटा से तैयार हुआ फ्रेमवर्क

शोधकर्ताओं ने 1995 से अब तक के आंकड़ों का विश्लेषण किया। इसमें मुख्य रूप से कोरल कवर और शैवाल की वृद्धि पर ध्यान दिया गया। वैज्ञानिकों के अनुसार, अधिक कोरल कवर इस बात का संकेत है कि रीफ स्वस्थ समुद्री जीवन को सहारा देने में सक्षम है, जबकि शैवाल की अधिक वृद्धि रीफ के खराब स्वास्थ्य का संकेत हो सकती है। सिन्हुआ की ओर से साझा जानकारी के मुताबिक, शोध टीम ने हर रीफ की स्थिति का आकलन करने के लिए उसके ऐतिहासिक आंकड़ों को आधार बनाया। इसके लिए केवल पूरे रीफ सिस्टम में अलग-अलग पाए जाने वाले ‘पूर्ण कोरल कवर’ पर निर्भर नहीं किया गया। शोधकर्ताओं ने 1980 के दशक के अंत से जुटाए गए संबंधित रीफ के ऐतिहासिक डेटा से वर्तमान स्थिति की तुलना की।

65 फीसदी से नीचे पहुंचते ही बढ़ता है संकट

USYD की पीएचडी कैंडिडेट और समुद्री पर्यावरण अनुसंधान में प्रकाशित अध्ययन की प्रमुख लेखिका केट व्हिटन ने बताया कि एक स्थान पर 30 प्रतिशत कोरल कवर स्वस्थ स्थिति का संकेत हो सकता है, जबकि किसी दूसरे स्थान पर यही आंकड़ा गिरावट का संकेत दे सकता है। अध्ययन में रीफ के लिए तीन पारिस्थितिक श्रेणियां निर्धारित की गई हैं—स्वस्थ, संघर्षरत और खतरे में। शोधकर्ताओं के अनुसार, जब कोरल कवर अपने ऐतिहासिक अधिकतम स्तर के करीब 65 प्रतिशत से नीचे चला जाता है, तो रीफ आमतौर पर संघर्ष की स्थिति में पहुंच जाता है। वहीं, 35 प्रतिशत से नीचे की गिरावट खतरे की स्थिति से जुड़ी पाई गई। इस स्थिति में शैवाल की वृद्धि बढ़ जाती है और रीफ बनाने वाले कोरल में भारी गिरावट आती है। व्हिटन के अनुसार, नया फ्रेमवर्क वैज्ञानिकों को खतरे में पहुंच चुकी रीफ की पहचान करने और उसके सुधार के लिए समय पर कदम उठाने की सिफारिश करने में मदद कर सकता है।

जटिल आकार वाले कोरल ज्यादा प्रभावित

शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि जटिल आकार वाले कोरल साधारण गोल आकार वाले कोरल की तुलना में अधिक प्रभावित होने वाली श्रेणी में आते हैं। कोरल की संरचना में बदलाव से रीफ चपटे हो सकते हैं, जिससे मछलियों के छिपने के स्थान कम हो जाते हैं और तूफानी लहरों से प्राकृतिक सुरक्षा भी घट जाती है।इसका असर समुद्री जीवों के पनपने और कोरल के दोबारा बढ़ने की क्षमता पर पड़ता है। शोधकर्ताओं का मानना है कि रीफ की संरचना और उसके स्वास्थ्य के बीच इस संबंध को समझना संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

ग्रेट बैरियर रीफ ऑस्ट्रेलिया के उत्तर-पूर्वी तट के पास प्रशांत महासागर में स्थित दुनिया की सबसे बड़ी प्रवाल भित्ति प्रणाली है। यह 2,300 किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में फैली है। इसमें 2,900 से अधिक अलग-अलग चट्टानें और करीब 900 द्वीप शामिल हैं। इसकी विशालता इतनी अधिक है कि इसे अंतरिक्ष से भी देखा जा सकता है।

WhatsApp Group जुड़ने के लिए क्लिक करें 👉 Join Now
Facebook
X
Threads
WhatsApp
Telegram
संबंधित खबरें.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *