नई दिल्ली : FCRA संशोधन विधेयक को लेकर संसद में बुधवार को जमकर हंगामा हुआ। सरकार ने विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) संशोधन विधेयक को 31 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजने का प्रस्ताव रखा। समिति में लोकसभा के 21 और राज्यसभा के 10 सदस्य शामिल होंगे। गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने विधेयक को जेपीसी के पास भेजने संबंधी प्रस्ताव सदन में पेश किया, जिसे हंगामे के बीच मंजूरी मिल गई। अब संयुक्त समिति अपनी रिपोर्ट संसद के शीतकालीन सत्र में सदन के सामने रखेगी।
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FCRA बिल पर लोकसभा में हंगामा
लोकसभा में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने जैसे ही FCRA संशोधन विधेयक पेश किया, विपक्षी सांसदों ने विरोध शुरू कर दिया। कांग्रेस ने विधेयक को वापस लेने की मांग की। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि पूरा विपक्ष इस विधेयक के खिलाफ है। उन्होंने इसे अल्पसंख्यकों के खिलाफ बताते हुए सदन में पेश नहीं करने की मांग की। वहीं, केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि यह विधेयक अल्पसंख्यकों के खिलाफ नहीं है। इसके बावजूद विपक्ष का हंगामा जारी रहा, जिसके चलते सदन की कार्यवाही दोपहर 3 बजे तक स्थगित कर दी गई।
विपक्ष ने JPC में भेजने की मांग का किया समर्थन
FCRA संशोधन विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजने के सरकार के प्रस्ताव का विपक्षी सांसदों ने समर्थन किया। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी बिल को JPC में भेजने की मांग का समर्थन किया। अखिलेश यादव ने सरकार से सवाल किया कि वह FCRA संशोधन विधेयक क्यों लाना चाहती है। उन्होंने आरोप लगाया कि इसका उद्देश्य अल्पसंख्यकों को दबाना और व्यवस्था का अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करना है।
डिंपल यादव ने भी किया JPC का समर्थन
समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव ने भी विधेयक को JPC के पास भेजे जाने का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि यदि इसे संयुक्त संसदीय समिति में भेजा जा रहा है तो यह अच्छी बात है। डिंपल यादव ने संस्थाओं और उनके जमीनी स्तर पर काम करने के तरीके में संभावित हेरफेर को लेकर आशंका जताई। उन्होंने आरोप लगाया कि शिक्षा के क्षेत्र में बच्चों के लिए काम करने वाले एनजीओ और अन्य संस्थाओं पर सरकार के अनुरूप काम नहीं करने की स्थिति में दबाव बनाया जाता है।
अवधेश प्रसाद ने सरकार की मंशा पर उठाए सवाल
इससे पहले समाजवादी पार्टी सांसद अवधेश प्रसाद ने भी FCRA संशोधन विधेयक को लेकर सरकार की मंशा पर सवाल उठाया था। उन्होंने कहा कि यदि सरकार की नीयत ठीक नहीं है तो ऐसे विधेयक को पारित करने का कोई मतलब नहीं है। उन्होंने कहा कि संसद में कई ऐसे कानून पारित हुए हैं, लेकिन बाद में वे प्रभावी तरीके से लागू नहीं हो सके या व्यावहारिक नहीं रहे।




