लेखक: सौमेन मुखर्जी, स्वतंत्र लेखक, राँची
राँची : शारदीय दुर्गोत्सव के 18 दिन बाद शरद ऋतु की अमावस्या की रात माँ काली की आराधना की जाती है। शहरों और ग्रामीण इलाकों में मंदिरों, पूजा मंडपों के साथ घरों में भी काली पूजा होती है। माँ काली को शुद्ध भाषा में ‘श्यामा’ भी कहा जाता है। श्याम का अर्थ काला होता है। माँ काली का चेहरा और संपूर्ण शरीर काला होने के कारण उन्हें श्यामा कहा जाता है। काली पूजा को कुछ भक्त ‘निशि पूजा’ भी कहते हैं। निशि का अर्थ रात है। माँ काली की पूजा रात्रि में होने के कारण यह नाम प्रचलित हुआ।
काली पूजा में शुद्धता और आचार-निष्ठा का महत्व
काली पूजा में अन्य देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना की तुलना में विधि-विधान का विशेष महत्व है। इसलिए पूजा का आयोजन करने वाले और पूजा कराने वाले ब्राह्मण को शुद्धता तथा आचार-निष्ठा का कठोरता से पालन करना पड़ता है। माँ काली की परंपरागत और निष्ठापूर्वक आराधना के साथ श्यामा संगीत के जरिए उन्हें रिझाया जाता है। पूजा मंडपों और मंदिरों में साउंड बॉक्स, लाउडस्पीकर, रिकॉर्डेड ऑडियो कैसेट, सीडी और यूट्यूब के माध्यम से श्यामा संगीत के भक्तिमूलक गीत बजाए जाते हैं। इससे पूजा का वातावरण भक्तिमय हो जाता है।
रामप्रसाद सेन और काजी नजरुल इस्लाम का योगदान
श्यामा संगीत के प्रमुख रचनाकारों में माँ काली के साधक रामप्रसाद सेन का नाम विशेष रूप से लिया जाता है। उन्होंने श्यामा संगीत के कई गीतों की रचना की और उन्हें संगीतबद्ध किया। काजी नजरुल इस्लाम ने भी श्यामा संगीत की रचना की और उन्हें संगीत से सजाया। उनके गीतों का जादू आज भी कायम है।
बंगाल के कलाकारों ने श्यामा संगीत को दिलाई पहचान
बंगाल के कई प्रबुद्ध कलाकारों ने अपनी मधुर आवाज से श्यामा संगीत को देश-दुनिया में विशेष पहचान दिलाई। धनंजय भट्टाचार्य, पन्नालाल भट्टाचार्य, रामकुमार चट्टोपाध्याय और श्रीकुमार चट्टोपाध्याय समेत कई कलाकारों ने श्यामा संगीत की गायकी से संगीत जगत को समृद्ध किया।
आज भी भक्तों को मंत्रमुग्ध करते हैं श्यामा संगीत
श्यामा संगीत के अनेक गीत आज भी भक्तों के बीच लोकप्रिय हैं। इनमें ‘मायेर पायेर जोबा होये होक ना फूटे मोन’, ‘सकलि तोमारी इच्छा’, ‘इच्छामयी तारा तुमि’, ‘तोमार कर्मो तुमि करो माँ’, ‘लोके बोले कोरि आमि’, ‘तुई नाकि माँ दयामयी’, ‘शुनेछि ओई लोकेर मुखे’ और ‘बोल रे जोबा बोल’ जैसे गीत शामिल हैं। ये सुमधुर गीत आज भी माँ काली के भक्तों को मंत्रमुग्ध करते हैं और काली पूजा के वातावरण को भक्तिमय बनाते हैं।
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