दिल्ली/रांची: सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड सरकार द्वारा DGP के पद की नियुक्ति को लेकर बनाए गए नए नियमों पर सख्त रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने प्रकाश सिंह बनाम भारत सरकार के ऐतिहासिक फैसले का हवाला देते हुए झारखंड सरकार के संशोधित महानिदेशक और पुलिस महानिरीक्षक चयन एवं नियुक्ति नियमावली, 2025 पर गंभीर सवाल खड़े किए है।
झारखंड सरकार ने पुलिस अधिनियम 1861 की धारा 46(2) और (3) के तहत राज्य में DGP चयन प्रक्रिया में बदलाव करते हुए वर्ष 2025 में नई नियमावली अधिसूचित की थी। इस नियम के तहत किसी अधिकारी की सेवानिवृत्ति की बची हुई सेवा अवधि यदि छह महीने से भी कम है, तो भी उसे कार्योत्तर सेवा का लाभ देकर DGP पद की नियुक्ति के लिए योग्य मान लिया गया।
सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी
मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने प्रथम दृष्टया माना कि यह प्रावधान सर्वोच्च अदालत द्वारा प्रकाश सिंह मामले में दिए गए दिशा-निर्देशों का सीधे तौर पर उल्लंघन करता है। अदालत ने कहा कि अगर इस नियम को रद्द किया जाता है, तो इसके तहत की गई नियुक्ति यानी झारखंड की वर्तमान DGP तदाशा मिश्रा की नियुक्ति को भी रद्द करना पड़ेगा। सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि प्राकृतिक न्याय का पालन करते हुए पुलिस महानिदेशक तदाशा मिश्रा को अपना पक्ष रखने का मौका दिया है। इसके साथ ही राज्य सरकार को निर्देश दिया गया है कि वह उन्हें नोटिस तामील कराए, ताकि वे अदालत के समक्ष अपना पक्ष प्रस्तुत कर सके।
अगली सुनवाई 3 नवंबर को
वहीं, कोर्ट ने झारखंड सरकार को स्वतंत्रता दी है कि वह इस विवादास्पद नियम पर पुनर्विचार करे या फिर अपना जवाबी हलफनामा दायर करे। शीर्ष अदालत ने वरिष्ठ अधिवक्ता एवं अमिकस क्यूरी (न्याय मित्र) राजू रामचंद्रन से अनुरोध किया गया है कि वे झारखंड के इन नियमों की वैधता की जांच करे। इसके अलावा संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) को भी निर्देश दिया गया है कि वह इस संबंध में अमिकस क्यूरी का सहयोग करें. शीर्ष अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 3 नवंबर की तारीख तय की है।




