अजा एकादशी 2026 कब है? जानें पूजा विधि, महत्व और पारण का समय

नई दिल्ली : हिंदू धर्म में एकादशी तिथि भगवान विष्णु की आराधना के लिए विशेष मानी जाती है। प्रत्येक महीने कृष्ण और शुक्ल पक्ष में एक-एक एकादशी आती है। इस तरह सामान्यतः वर्ष में 24 एकादशी व्रत होते हैं। सितंबर 2026 में भी दो प्रमुख

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नई दिल्ली : हिंदू धर्म में एकादशी तिथि भगवान विष्णु की आराधना के लिए विशेष मानी जाती है। प्रत्येक महीने कृष्ण और शुक्ल पक्ष में एक-एक एकादशी आती है। इस तरह सामान्यतः वर्ष में 24 एकादशी व्रत होते हैं। सितंबर 2026 में भी दो प्रमुख एकादशी पड़ेंगी। पहली अजा एकादशी 7 सितंबर 2026, सोमवार को और दूसरी परिवर्तिनी एकादशी 22 सितंबर 2026, मंगलवार को होगी। पंचांग के अनुसार अजा एकादशी की तिथि 6 सितंबर की शाम से शुरू होकर 7 सितंबर की शाम तक रहेगी। वहीं, परिवर्तिनी एकादशी 21 सितंबर की रात से शुरू होकर 22 सितंबर की रात तक रहेगी।

अजा एकादशी का महत्व

भाद्रपद कृष्ण पक्ष की एकादशी को अजा एकादशी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और व्रत करने से पापों से मुक्ति तथा आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है। भक्त अपनी क्षमता के अनुसार निर्जल या फलाहार व्रत रखते हैं और भगवान विष्णु का ध्यान करते हैं। अजा एकादशी पर भगवान विष्णु को पीले फूल, तुलसी दल, फल और नैवेद्य अर्पित करने की परंपरा है। इसके साथ विष्णु मंत्र का जाप और विष्णु सहस्रनाम का पाठ भी किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा के साथ व्रत करने से मन को शांति मिलती है और व्यक्ति को संयम व आत्मनियंत्रण की प्रेरणा मिलती है।

परिवर्तिनी एकादशी क्यों है खास?

भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है। इसे पार्श्व एकादशी और जलझूलनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं में इस दिन भगवान विष्णु के शयन अवस्था में करवट बदलने का उल्लेख मिलता है। इसी वजह से इसे परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करने की परंपरा है। भक्त व्रत रखते हैं, मंदिरों में दर्शन करते हैं और भगवान को तुलसी दल अर्पित करते हैं। कुछ स्थानों पर भगवान विष्णु की विशेष शोभायात्रा और धार्मिक आयोजन भी किए जाते हैं।

एकादशी पर कैसे करें पूजा?

एकादशी के दिन सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और साफ वस्त्र पहनें। इसके बाद पूजा स्थल की सफाई कर भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। दीपक और धूप जलाकर भगवान विष्णु का ध्यान करें। पूजा में पीले फूल, तुलसी दल, फल और नैवेद्य अर्पित किए जा सकते हैं। इसके बाद ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करें। श्रद्धालु अपनी सुविधा के अनुसार विष्णु सहस्रनाम, गीता या भगवान विष्णु से संबंधित धार्मिक कथा का पाठ कर सकते हैं। एकादशी व्रत में अन्न और चावल का सेवन न करने की धार्मिक परंपरा है। कई श्रद्धालु फलाहार करते हैं, जबकि कुछ लोग निर्जल व्रत भी रखते हैं। स्वास्थ्य संबंधी परेशानी होने पर कठोर उपवास से बचना चाहिए।

द्वादशी को किया जाता है पारण

एकादशी व्रत का समापन द्वादशी तिथि पर पारण के साथ किया जाता है। पंचांग में दिए गए पारण समय के अनुसार ही व्रत खोलना उचित माना जाता है। एक पंचांग गणना के अनुसार सितंबर 2026 में अजा एकादशी का पारण 8 सितंबर की सुबह और परिवर्तिनी एकादशी का पारण 23 सितंबर की सुबह निर्धारित है। हालांकि, पारण का सटीक समय स्थान के सूर्योदय और स्थानीय पंचांग के अनुसार बदल सकता है। इसलिए व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं को स्थानीय पंचांग के अनुसार समय की पुष्टि करनी चाहिए।

दान और सेवा का भी महत्व

एकादशी के दिन पूजा-पाठ के साथ दान और सेवा को भी महत्वपूर्ण माना जाता है। जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन, फल, वस्त्र या अपनी क्षमता के अनुसार अन्य उपयोगी वस्तुएं दान की जा सकती हैं। धार्मिक दृष्टि से एकादशी केवल उपवास रखने का दिन नहीं, बल्कि मन, वाणी और कर्म में संयम रखने का अवसर भी मानी जाती है। धार्मिक तिथियों और व्रत-पारण के समय में अलग-अलग क्षेत्रों और संप्रदायों के अनुसार कुछ अंतर हो सकता है। इसलिए व्रत रखने से पहले स्थानीय पंचांग या मंदिर की परंपरा के अनुसार समय की पुष्टि करना उचित रहेगा।

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