जमशेदपुर। राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने आज शक्रवार को माईकल जॉन सभागार, टाटानगर, जमशेदपुर में ‘राष्ट्रीय हस्तकरघा दिवस’ के अवसर पर विवर्स डेवलपमेंट एण्ड रिसर्च ऑर्गेनाईजेशन (WDRO) द्वारा आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि राष्ट्रीय हस्तकरघा दिवस उन लाखों बुनकरों के श्रम, कौशल एवं सृजनशीलता को सम्मान देने का अवसर है, जिन्होंने सदियों से भारत की सांस्कृतिक पहचान को अपने हाथों से बुना है। उन्होंने कहा कि हस्तकरघा केवल वस्त्र निर्माण का माध्यम नहीं, बल्कि भारत की संस्कृति, परंपरा एवं आत्मनिर्भरता का सशक्त प्रतीक है।
राज्यपाल ने कहा कि राष्ट्रीय हस्तकरघा दिवस के अवसर पर यह स्मरण करना भी प्रासंगिक है कि वर्ष 1942 में प्रारम्भ हुए भारत छोड़ो आंदोलन ने स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा प्रदान की थी। उस दौर में चरखा, खादी और हस्तकरघा केवल वस्त्र निर्माण के साधन नहीं थे, बल्कि स्वदेशी, आत्मनिर्भरता एवं राष्ट्रीय स्वाभिमान के सशक्त प्रतीक बन गए थे। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने खादी एवं स्वदेशी को जन-आंदोलन का स्वरूप देकर देशवासियों में आत्मनिर्भरता और आत्मगौरव की भावना का संचार किया।
उन्होंने कहा कि झारखंड की जनजातीय एवं ग्रामीण परंपराओं में हस्तकरघा एवं हस्तशिल्प की समृद्ध विरासत विद्यमान है। राज्य का तसर रेशम अपनी उत्कृष्ट गुणवत्ता के लिए देशभर में विशेष पहचान रखता है। कहा कि आधुनिक तकनीक, नवाचार, डिज़ाइन, विपणन तथा डिजिटल माध्यमों से जोड़कर बुनकरों के उत्पादों को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय बाजार उपलब्ध कराया जाना समय की आवश्यकता है।
राज्यपाल ने अपने सार्वजनिक जीवन के अनुभवों का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्हें बुनकर समाज के बीच जाकर उनकी समस्याओं को निकट से समझने तथा केन्द्र सरकार में वस्त्र मंत्री के रूप में कार्य करते हुए उनके हितों के लिए कार्य करने का सौभाग्य मिला। उन्होंने कहा कि उनके कार्यकाल में राष्ट्रीय हस्तकरघा दिवस मनाने की पहल प्रारंभ हुई, जिसका उद्देश्य देश के बुनकरों के श्रम, कौशल एवं योगदान को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान देना तथा हस्तकरघा क्षेत्र को नई पहचान प्रदान करना था।
राज्यपाल महोदय ने कहा कि प्रधानमंत्री द्वारा ‘वोकल फॉर लोकल’, ‘आत्मनिर्भर भारत’ तथा ‘पीएम विश्वकर्मा योजना’ जैसी अनेक पहलों के माध्यम से बुनकरों, शिल्पकारों एवं पारंपरिक कारीगरों को सशक्त बनाने का कार्य किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि भारत की पारंपरिक कला एवं हस्तशिल्प केवल हमारी सांस्कृतिक विरासत ही नहीं, बल्कि विकसित भारत की आर्थिक शक्ति भी बन सकते हैं। उन्होंने कहा कि हस्तकरघा क्षेत्र के समग्र विकास के लिए डिज़ाइन नवाचार, गुणवत्तापूर्ण उत्पादन, ब्रांडिंग, कौशल उन्नयन तथा युवाओं की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि शैक्षणिक संस्थान, उद्योग जगत, स्वयंसेवी संगठन एवं सरकार के संयुक्त प्रयासों से हस्तकरघा उद्योग को नई गति मिलेगी तथा विशेष रूप से महिलाओं एवं ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार एवं आत्मनिर्भरता के नए अवसर सृजित होंगे।
राज्यपाल ने सभी नागरिकों से हस्तकरघा उत्पादों को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाने का आह्वान करते हुए कहा कि जब हम हस्तकरघा से निर्मित कोई उत्पाद खरीदते हैं, तब हम केवल एक वस्त्र नहीं, बल्कि एक बुनकर परिवार की आजीविका को सशक्त करते हैं तथा ‘आत्मनिर्भर भारत’ के संकल्प को मजबूत बनाते हैं। उक्त अवसर पर राज्यपाल ने उत्कृष्ट कार्य करने वाले बुनकरों को सम्मानित भी किया।




