रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने जमशेदपुर के अखिलेश सिंह को आर्म्स एक्ट मामले में बरी करने के निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा है। अदालत ने राज्य सरकार की ओर से दायर एक्विटल अपील में कोई मेरिट नहीं पाते हुए उसे खारिज कर दिया।
अदालत ने कहा कि आरोपी की स्वीकारोक्ति साबित नहीं हुई है। साथ ही, जिस परिसर से हथियार बरामद किया गया था, वह आरोपी के नियंत्रण में भी नहीं था। ऐसे में हथियार की बरामदगी संदेहास्पद हो जाती है।
also read : जामताड़ा में रेलवे की डाउन लाइन पर मिले दो शव, इलाके में हड़कंप
दरअसल, यह मामला जमशेदपुर के सिदगोड़ा थाना कांड संख्या 86/2004 से संबंधित है। पुलिस ने अखिलेश सिंह के खिलाफ आर्म्स एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया था। जमशेदपुर के 12वें अपर सत्र न्यायाधीश की अदालत ने 12 अगस्त 2021 को साक्ष्यों के अभाव में अखिलेश सिंह को आरोपों से बरी कर दिया था। इस फैसले को राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
पुलिस की प्राथमिकी के अनुसार, नौ अक्टूबर 2004 की रात सकची थाना कांड संख्या 50/2002 में गिरफ्तार अखिलेश सिंह ने कथित तौर पर पुलिस के समक्ष स्वीकारोक्ति की थी। इसमें उसने सिदगोड़ा थाना क्षेत्र के एक क्वार्टर में नौ एमएम की पिस्टल और कारतूस छिपाकर रखने की जानकारी दी थी।
इस सूचना के आधार पर पुलिस की टीम ने रात करीब तीन बजे क्वार्टर संख्या 59 में छापेमारी की। पुलिस ने ताला तोड़कर तलाशी ली, जिसमें बेडरूम की एक रैक से प्लास्टिक में लिपटी नौ एमएम की पिस्टल बरामद होने का दावा किया गया। पिस्टल की मैगजीन में 12 कारतूस थे। पुलिस ने हथियार और कारतूस जब्त कर जब्ती सूची तैयार की थी।
पुलिस के अनुसार, पूछताछ में अखिलेश सिंह ने कथित तौर पर बताया था कि पिस्टल रंजीत चौधरी ने पटना के मनोज सिंह से खरीदी थी और उसे सुरक्षा व अपराध करने के उद्देश्य से दिया गया था. इसके बाद सिदगोड़ा थाने में आर्म्स एक्ट के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई।
also read :ट्रक-बोलेरो की टक्कर में दो लोग घायल, रिम्स रेफर
मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने पांच गवाह पेश किए थे। सभी गवाह पुलिसकर्मी थे और छापेमारी दल के सदस्य थे। उन्होंने तलाशी और हथियारों की बरामदगी के संबंध में गवाही दी थी। अभियोजन पक्ष ने जब्ती सूची, प्राथमिकी, जांच रिपोर्ट, स्वीकृति रिपोर्ट और कथित स्वीकारोक्ति के एक हिस्से सहित अन्य दस्तावेज भी प्रस्तुत किए थे। राज्य सरकार की ओर से हाईकोर्ट में दलील दी गई कि आरोपी की स्वीकारोक्ति के आधार पर हथियार और कारतूस बरामद हुए थे और बंद परिसर से बरामदगी के पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं।
मामले के रिकॉर्ड और निचली अदालत के फैसले की समीक्षा के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि आरोपी की कथित स्वीकारोक्ति साबित नहीं हुई थी। इसके अलावा, जिस परिसर से हथियार बरामद किया गया, उस पर आरोपी का नियंत्रण भी स्थापित नहीं किया जा सका था। इन परिस्थितियों में बरामदगी को आरोपी के खिलाफ विश्वसनीय साक्ष्य नहीं माना जा सकता।
अदालत ने राज्य सरकार की अपील में कोई मेरिट नहीं पाते हुए अपील की अनुमति मांगने संबंधी आवेदन खारिज कर दिया। इसके साथ ही विलंब माफी से संबंधित आवेदन भी खारिज कर दिया। राज्य सरकार की अपील खारिज हो गई और अखिलेश सिंह को बरी करने का निचली अदालत का फैसला बरकरार रहा।




