तीन अक्टूबर को रखा जाएगा जिउतिया व्रत 2 अक्टूवर को नहाय-खाय

रांची। संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य के लिए रखा जाने वाला सबसे कठिन और पवित्र व्रत—जीवित्पुत्रिका (जिउतिया) इस वर्ष 3 अक्टूबर, शनिवार को मनाया जाएगा। तीन दिनों तक चलने वाले इस महापर्व की शुरुआत 2 अक्टूबर को ‘नहाय-खाय’ के साथ होगी,

जिउतिया व्रत

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रांची। संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य के लिए रखा जाने वाला सबसे कठिन और पवित्र व्रत—जीवित्पुत्रिका (जिउतिया) इस वर्ष 3 अक्टूबर, शनिवार को मनाया जाएगा। तीन दिनों तक चलने वाले इस महापर्व की शुरुआत 2 अक्टूबर को ‘नहाय-खाय’ के साथ होगी, जबकि 4 अक्टूबर को व्रत का पारण किया जाएगा।

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यह व्रत मुख्य रूप से बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। आइए जानते हैं इस पर्व के तीनों दिनों के नियम, पूजा का शुभ मुहूर्त और इस व्रत से जुड़ी खास बातें। इस वर्ष तीन दिवसीय जिउतिया पर्व की मुख्य तिथियां

  • 2 अक्टूबर (शुक्रवार): नहाय-खाय (व्रत की शुरुआत, सात्विक भोजन)
  • 3 अक्टूबर (शनिवार): निर्जला जिउतिया व्रत और भगवान जीमूतवाहन की पूजा
  • 4 अक्टूबर (रविवार): व्रत का पारण (व्रत समाप्ति)
पर्व के नियम और अनुष्ठान
  • नहाय-खाय (2 अक्टूबर): व्रत के पहले दिन महिलाएं स्नान करने के बाद सात्विक भोजन ग्रहण करती हैं। इस दिन कई जगहों पर मडुआ की रोटी और नोनी का साग खाने की विशेष परंपरा है। इसके बाद अगले 24 घंटों से अधिक समय के लिए अन्न-जल का त्याग कर दिया जाता है।
  • निर्जला उपवास (3 अक्टूबर): आश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर माताएं अपनी संतान की दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना के लिए निर्जला (बिना पानी के) उपवास रखती हैं।
  • पारण (4 अक्टूबर): सूर्योदय के बाद और नियमानुसार विधि-विधान से पूजा करने के बाद महिलाएं अन्न-जल ग्रहण कर अपना व्रत खोलती हैं।
  • क्यों रखा जाता है जिउतिया व्रत? (धार्मिक महत्व)

    • जीमूतवाहन की कथा: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गंधर्वराज जीमूतवाहन ने नागवंश की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी थी। उनके इसी महान त्याग और करुणा की स्मृति में माताएं अपनी संतानों की रक्षा और उनकी लंबी उम्र के लिए यह व्रत रखती हैं।
    • चील-सियारिन की कथा: पूजा के दौरान कथा सुनने का विशेष विधान है, जिसमें चील और सियारिन से जुड़ी पौराणिक कथा का श्रवण किया जाता है, जो इस व्रत के अनुशासन और निष्ठा का प्रतीक है।
    • बदलती परंपरा: समय के साथ इस व्रत की परंपरा में एक सकारात्मक बदलाव आया है। अब केवल पुत्र ही नहीं, बल्कि कई परिवारों में माताएं बेटे और बेटी दोनों की दीर्घायु के लिए यह कठिन उपवास रखती हैं।

    यदि आप पहली बार यह व्रत रख रही हैं, तो स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखें और नहाय-खाय के दिन हल्का व पौष्टिक आहार ही लें।

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