झारखंड में भाजपा-मारवाड़ी समाज के रिश्तों में क्यों आई खटास?

लेखक : सांवर मल अग्रवाल रांची : झारखंड की राजनीति में मारवाड़ी समाज और भारतीय जनता पार्टी का रिश्ता बेहद गहरा और बहुआयामी रहा है। पारंपरिक रूप से इस समुदाय को भाजपा का एक मजबूत आधार माना जाता रहा है। हालांकि, सत्ता प्राप्ति से पहले

मारवाड़ी समाज
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लेखक : सांवर मल अग्रवाल

रांची : झारखंड की राजनीति में मारवाड़ी समाज और भारतीय जनता पार्टी का रिश्ता बेहद गहरा और बहुआयामी रहा है। पारंपरिक रूप से इस समुदाय को भाजपा का एक मजबूत आधार माना जाता रहा है। हालांकि, सत्ता प्राप्ति से पहले और सत्ता में आने के बाद इस रिश्ते में जो बदलाव आए हैं, उनके पीछे कई राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक कारण रहे हैं। झारखंड में भाजपा के लिए मारवाड़ी समुदाय को एक स्थायी राजनीतिक पूंजी के रूप में देखा जाता रहा है। राजनीतिक और आर्थिक संकट के दौर में भी यह समुदाय भाजपा के साथ खड़ा रहा। जहां-जहां मारवाड़ी समाज का प्रभाव रहा, वहां भाजपा को चुनावी लाभ मिलता रहा है। टाटानगर, रांची, हटिया, झरिया, धनबाद, हजारीबाग आदि इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

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मारवाड़ी समाज संख्या बल के लिहाज से भले ही बहुत बड़ा समुदाय नहीं हो, लेकिन चुनावों को प्रभावित करने की उसकी क्षमता काफी अधिक रही है। इसका एक प्रमुख कारण व्यापारिक केंद्रों के माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों के साथ उसका लगातार संपर्क है। व्यापार और सामाजिक संबंधों के जरिए यह समुदाय लंबे समय तक भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। दूसरे शब्दों में कहें तो व्यापारिक समुदाय अपने संपर्कों को राजनीतिक समर्थन में बदलने की क्षमता रखता है और चुनाव के समय भाजपा को इसका लाभ मिलता रहा है।

आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका

झारखंड के आर्थिक और सामाजिक विकास में मारवाड़ी समाज आज भी सक्रिय भूमिका निभा रहा है। व्यापार, शिक्षा, परोपकार और सेवा के क्षेत्र में इस समाज की मजबूत पकड़ है। मारवाड़ी समाज केवल मतदान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भाजपा के संगठनात्मक ढांचे, प्रचार-प्रसार और चुनावी अभियानों को मजबूत करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता आया है। लेकिन संगठन में राजनीतिक उपेक्षा का भाव बढ़ने पर यह जमीनी सहयोग और उत्साह प्रभावित हो सकता है। मारवाड़ी और राजपूत जैसे समुदाय लंबे समय से भाजपा के पारंपरिक समर्थक और वोटर रहे हैं। यदि इन समुदायों में लगातार यह भावना मजबूत होती है कि उन्हें ‘सुरक्षित वोट बैंक’ मानकर नजरअंदाज किया जा रहा है, तो इसका असर चुनाव के समय देखने को मिल सकता है।

जरूरी नहीं कि ऐसे मतदाता किसी दूसरे दल को वोट दें, लेकिन नाराजगी के कारण मतदान के प्रति उदासीनता जरूर बढ़ सकती है। इसका सीधा असर शहरी विधानसभा सीटों पर भाजपा के वोट मार्जिन पर पड़ सकता है और कुछ क्षेत्रों में पार्टी को नुकसान भी उठाना पड़ सकता है। हालांकि भाजपा का मानना रहा है कि मारवाड़ी समुदाय वैचारिक रूप से आज भी उसके साथ है और आगे भी बना रहेगा।

टिकट और राजनीतिक भागीदारी को लेकर सवाल

समाज के कई मंचों पर यह आवाज उठती रही है कि भाजपा मारवाड़ी समुदाय को केवल फंड प्रदाता या सुरक्षित वोट बैंक के रूप में देख रही है। जब विधानसभा या लोकसभा में राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने की बात आती है तो समुदाय के साथ अपेक्षित व्यवहार नहीं किया जाता। भाजपा के विपक्ष में रहने के दौर में मारवाड़ी समाज पार्टी के लिए एक मजबूत आधार था। लेकिन सत्ता में आने के बाद व्यापक जनाधार और सामाजिक समीकरण साधने की मजबूरी में भाजपा की प्राथमिकताओं की लंबी सूची में यह समुदाय कुछ पीछे जरूर खिसका है।

मारवाड़ी समाज के सेवा भाव, सभी वर्गों के साथ शालीन व्यवहार और सामाजिक सरोकारों का राजनीतिक लाभ भाजपा को कई बार मिला है। रामगढ़ से विश्वनाथ चौधरी और शंकर चौधरी जैसे नेताओं का भाजपा से विधायक बनना इसका उदाहरण रहा है। संथाल परगना क्षेत्र के गोड्डा से भी इस समुदाय को भाजपा की ओर से राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिला। रांची के हटिया से रामजी लाल सदा विजयी हुए और राज्य की पहली सरकार में विधायक के साथ विधि मंत्री भी बने। पंडित सत्यनारायण दुबे भी विधायक बने।

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि संख्या बल अधिक नहीं होने के बावजूद सामाजिक सरोकारों और जनसंपर्क के माध्यम से मारवाड़ी समाज ने भाजपा को राजनीतिक लाभ पहुंचाया। धनबाद जैसे क्षेत्र में, जहां बाहुबल और रंगदारी के प्रभाव की राजनीति की चर्चा होती रही है, वहां भी मारवाड़ी समाज के चंद्रशेखर अग्रवाल को मेयर बनाने में भाजपा सफल रही। इसे भी समाज के व्यापक सामाजिक सरोकारों और जनसंपर्क का परिणाम माना जा सकता है।

समर्पित कार्यकर्ताओं का योगदान

भाजपा के संगठन को मजबूत करने में मारवाड़ी समाज के अनेक समर्पित लोगों का योगदान रहा है। सीताराम मारू, ज्ञान प्रकाश जैन, ज्ञानू बाबू रामावतार लाल अग्रवाल, हजारीबाग के परमेश्वर अग्रवाल, मदनलाल अग्रवाल, कमलापति राम जैसे लोगों ने जनसेवा, जनसंपर्क और सामाजिक सेवा के माध्यम से पार्टी को लगातार मजबूती दी। सीताराम मारू के योगदान का राजनीतिक प्रतिफल अजय मारू के राज्यसभा पहुंचने के रूप में भी सामने आया। इसी तरह महेश पोद्दार राज्यसभा पहुंचे। उन्हें तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष डॉ. रविंद्र राय और तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास के संयुक्त प्रयासों का लाभ मिला। महेश पोद्दार भाजपा के दो बार झारखंड प्रदेश कोषाध्यक्ष भी रहे। उनका व्यवहार, सरलता और मृदुभाषी व्यक्तित्व पार्टी के भीतर अलग पहचान रखता था।

2014 और 2019 के बाद बदले राजनीतिक समीकरण

भाजपा में वर्ष 2014 और 2019 के बाद मारवाड़ी समाज और संगठन के बीच दूरियां बढ़ने की चर्चा शुरू हुई। इसे एक रणनीति के तौर पर भी देखा गया, जिसके तहत आदिवासी और पिछड़े वर्गों को अधिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने की योजना बनाई गई। इस दौरान मारवाड़ी समाज और व्यापारियों के एक वर्ग को यह महसूस होने लगा कि वे सत्ता के केंद्र में पहले जैसी स्थिति में नहीं हैं। भाजपा ने इस दौर में बड़े सामाजिक समूहों और नए राजनीतिक-सामाजिक समीकरणों पर अधिक ध्यान देना शुरू किया। इसी समय मारवाड़ी समाज का व्यक्तिगत राजनीतिक प्रभाव धीरे-धीरे संगठन के भीतर सीमित होता चला गया।

झारखंड में आज भी मारवाड़ी समाज आर्थिक और सामाजिक विकास में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। व्यापार, शिक्षा, परोपकार और सेवा के क्षेत्र में उसकी पकड़ कायम है। इस समाज द्वारा संचालित संस्थानों और चेंबर ऑफ कॉमर्स जैसी संस्थाओं का प्रभाव भी बना हुआ है। संगठनात्मक चुनावों और सामाजिक गतिविधियों में मारवाड़ी समाज की सक्रियता स्पष्ट दिखाई देती है। इसके बावजूद भाजपा के समुदाय के साथ व्यवहार को लेकर समाज के भीतर, खासकर युवा वर्ग में, नाराजगी दिखाई देने की चर्चा है। यह नाराजगी खुलकर सामने नहीं आ रही है, लेकिन पर्दे के पीछे राजनीतिक असंतोष का एक दौर चल रहा है। संभव है कि समय आने पर इसका परिणाम स्पष्ट रूप से सामने आए और भाजपा को इसका कुछ राजनीतिक नुकसान उठाना पड़े।

वोट बैंक से आगे राजनीतिक पहचान की मांग

राजनीतिक मोर्चे पर मारवाड़ी समाज का असंतोष और अस्तित्व की लड़ाई फिलहाल प्रत्यक्ष रूप से दिखाई नहीं देती, लेकिन समुदाय अपनी राजनीतिक पहचान की मांग बनाए हुए है। अब वह खुद को केवल वोट बैंक या आर्थिक सहयोगी के रूप में देखे जाने के पक्ष में नहीं है। समाज की अपेक्षा है कि राज्य की मुख्यधारा की राजनीति में उसे उसकी सामाजिक और आर्थिक भूमिका के अनुरूप राजनीतिक पहचान मिले। भाजपा में मौजूद समुदाय के जमीनी कार्यकर्ता और पदाधिकारी भी इस बात को लेकर नाराज बताए जाते हैं कि पार्टी की ओर से मारवाड़ी समाज को बड़ी राजनीतिक जिम्मेदारियां देने या चुनावों में पर्याप्त टिकट देने में दूरी बढ़ी है।

भाजपा के लिए कितना महत्वपूर्ण है यह रिश्ता?

यदि इन तमाम परिस्थितियों का अध्ययन किया जाए तो निष्कर्ष यही निकलता है कि झारखंड का मारवाड़ी समुदाय भाजपा नेतृत्व से अपनी अनदेखी को लेकर निश्चित रूप से कुछ नाराज दिखाई दे रहा है। यह वही समुदाय है जिसे लंबे समय तक भाजपा की ‘रीढ़’ और व्यापारियों की पार्टी का मजबूत आधार माना जाता रहा है। यदि यही समुदाय भाजपा से दूरी बनाकर दूसरे राजनीतिक दलों में अपना स्थान तलाशने लगा तो झारखंड की राजनीति में इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।

झारखंड मुक्ति मोर्चा और अन्य विपक्षी दल निश्चित रूप से इस अवसर का लाभ उठाने की कोशिश करेंगे। जिन शहरी क्षेत्रों में लंबे समय तक मारवाड़ी समाज के राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव के कारण विपक्षी दलों के लिए मजबूत आधार बनाना कठिन रहा, वहां समीकरण बदल सकते हैं। पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में, खासकर रांची में, ऐसे बदलते समीकरणों की झलक देखने को मिली है। मारवाड़ी समाज के कुछ लोगों का मानना है कि इस समुदाय को हाशिये पर रखने की प्रक्रिया यशवंत सिन्हा के रांची से विधायक बनने और बाद में इस्तीफा देने के बाद पलामू लॉबी के प्रभाव से शुरू हुई थी, जो आज अधिक स्पष्ट दिखाई देने लगी है।

हालांकि, एक अन्य महत्वपूर्ण कारण की ओर भी ध्यान देने की जरूरत है। इस समुदाय से जो विधायक, सांसद बने या पार्टी के ऊंचे पदों तक पहुंचे, उनमें से कई ने अपने समाज के लोगों को राजनीतिक रूप से आगे बढ़ाने में अपेक्षित रुचि नहीं दिखाई। इसका असर भी धीरे-धीरे समुदाय की राजनीतिक स्थिति पर पड़ा। अंततः यह सवाल केवल भाजपा और मारवाड़ी समाज के रिश्ते का नहीं है, बल्कि झारखंड की बदलती शहरी राजनीति का भी है। जिस समुदाय ने लंबे समय तक भाजपा के संगठन, चुनावी अभियानों और आर्थिक-सामाजिक गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, यदि उसके भीतर राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सम्मान को लेकर असंतोष बढ़ता है तो भाजपा के लिए इसे नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।

समय बताएगा कि यह नाराजगी केवल राजनीतिक अपेक्षाओं तक सीमित रहती है या आने वाले चुनावों में इसका कोई ठोस असर दिखाई देता है। लेकिन इतना तय है कि झारखंड की राजनीति में भाजपा और मारवाड़ी समाज के बीच बदलते रिश्तों को अब केवल पारंपरिक वोट बैंक के नजरिये से नहीं देखा जा सकता।

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