IIIT रांची ने पौधों में तलाशा मां का आंचल

राँची: कहते हैं कि मां सिर्फ हमें जन्म नहीं देती, बल्कि वह हमारा पालन-पोषण भी करती है। ठीक वैसे ही, जैसे यह धरती और हमारी प्रकृति करती है। जब ममता और प्रकृति का यह खूबसूरत रिश्ता एक साथ मिलता है, तो कुछ ऐसा ही नजारा


राँची: कहते हैं कि मां सिर्फ हमें जन्म नहीं देती, बल्कि वह हमारा पालन-पोषण भी करती है। ठीक वैसे ही, जैसे यह धरती और हमारी प्रकृति करती है। जब ममता और प्रकृति का यह खूबसूरत रिश्ता एक साथ मिलता है, तो कुछ ऐसा ही नजारा दिखता है जैसा आज रांची के IIIT यानी भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान के कैंपस में देखने को मिला। भारत सरकार के ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान के तहत संस्थान में एक बेहद खास और दिल को छू लेने वाले पौधारोपण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। आमतौर पर कंप्यूटर कोडिंग और तकनीकी चर्चाओं से गूंजने वाला यह कैंपस उस दिन मिट्टी की सोंधी खुशबू और पौधों की हरियाली से सराबोर था। इस मुहिम में सिर्फ औपचारिकता निभाने के लिए पेड़ नहीं लगाए गए, बल्कि संस्थान के डायरेक्टर से लेकर फैकल्टी और कर्मचारियों ने अपनी माँ को याद करते हुए पूरे उत्साह के साथ मिट्टी में अपनी जड़ें रोपीं।


डायरेक्टर ने बढ़ाया पहला कदम, फिर गूंज उठा देखभाल का संकल्प

इस भावुक और प्रेरणादायक मौके पर प्रोफेसर राजीव श्रीवास्तव ने वहां मौजूद लोगों से दिल की बात कही। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि अक्सर हम पर्यावरण के बिगड़ने का रोना तो रोते हैं, लेकिन जिम्मेदारी दूसरों पर डाल देते हैं। पर्यावरण को बचाना सिर्फ सरकार या किसी एक संस्था का ठेका नहीं है। यह इस देश के हर एक नागरिक का नैतिक कर्तव्य है। उन्होंने एक सीधा और सरल गणित समझाया कि अगर आज हममें से हर एक व्यक्ति अपनी माँ के नाम पर सिर्फ एक पौधा लगा दे और उसकी जिम्मेदारी उठा ले, तो हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को एक ऐसी दुनिया दे पाएंगे जो स्वच्छ होगी, हरी-भरी होगी और जहां खुलकर सांस ली जा सकेगी।


मां और मिट्टी का अटूट रिश्ता

‘एक पेड़ मां के नाम’ सिर्फ एक सरकारी अभियान नहीं, बल्कि एक भावना है। यह प्रकृति की निश्छल छांव और माँ के आंचल, दोनों के प्रति अपना आभार जताने का एक बेहद संवेदनशील जरिया है। इसी अपनेपन और जिम्मेदारी के अहसास के साथ ट्रिपल आईटी रांची के परिवार ने धरती मां की गोद को हरा-भरा करने में अपना छोटा सा योगदान दिया। वैसे, IIIT रांची के लिए यह कोई पहला मौका नहीं है। संस्थान समय-समय पर ऐसे सामाजिक और पर्यावरण से जुड़े आयोजन करता रहता है। मकसद सिर्फ एक ही है कि तकनीकी शिक्षा ले रहे छात्र सिर्फ मशीनों की भाषा न सीखें, बल्कि वे प्रकृति की इस मूक भाषा को भी समझें और समाज को एक बेहतर कल देने के लिए हमेशा तैयार रहें।

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