छात्रों में हार्मोन प्रभावित करने वाले पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स का बढ़ा इस्तेमाल

नई दिल्ली.सोशल मीडिया अब केवल मनोरंजन और दोस्तों से जुड़े रहने का माध्यम नहीं रह गया है। खासकर किशोरों की रोजमर्रा की जिंदगी में इसका प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। अमेरिका में हुई एक नई रिसर्च में सोशल मीडिया के इस्तेमाल और किशोरों के

नई दिल्ली.सोशल मीडिया अब केवल मनोरंजन और दोस्तों से जुड़े रहने का माध्यम नहीं रह गया है। खासकर किशोरों की रोजमर्रा की जिंदगी में इसका प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। अमेरिका में हुई एक नई रिसर्च में सोशल मीडिया के इस्तेमाल और किशोरों के पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स के उपयोग के बीच संबंध सामने आया है।अमेरिका के रटगर्स विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं की इस स्टडी को Journal of Exposure Science & Environmental Epidemiology में प्रकाशित किया गया है। शोध में न्यू जर्सी के प्रिंसटन हाई स्कूल के 143 छात्रों को शामिल किया गया।

छात्रों से पूछा गया कि उन्होंने पिछले 24 घंटे में साबुन, शैंपू, डियोड्रेंट, परफ्यूम, सनस्क्रीन, स्किन केयर और मेकअप जैसे कितने पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल किया।रिसर्च में पाया गया कि सोशल मीडिया और ब्यूटी से जुड़े कंटेंट का इस्तेमाल जितना अधिक था, छात्रों के बीच पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स का उपयोग भी उतना ही ज्यादा था।जिन छात्रों ने ऐसे सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स को फॉलो किया, जिनकी अपनी प्रोडक्ट लाइन थी, उन्होंने पिछले 24 घंटे में औसतन 30 फीसदी ज्यादा पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स इस्तेमाल किए। वहीं, हेयर या ब्यूटी ट्यूटोरियल देखने वाले छात्रों में प्रोडक्ट इस्तेमाल करीब 40 फीसदी अधिक पाया गया।

शोधकर्ताओं के मुताबिक, साबुन, टूथपेस्ट, शैंपू, डियोड्रेंट, सनस्क्रीन, परफ्यूम, स्किन केयर और मेकअप जैसे पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हैं। इनमें से कुछ उत्पादों में फ्थैलेट्स, पैराबेन्स और फेनॉल्स जैसे रसायन पाए जा सकते हैं।

इनमें से कुछ रसायनों को हार्मोन सिग्नलिंग पर संभावित प्रभाव और कुछ स्वास्थ्य जोखिमों से जोड़ा गया है। हालांकि, किसी उत्पाद में किसी रसायन की मौजूदगी का यह मतलब नहीं है कि उसके इस्तेमाल से निश्चित रूप से बीमारी होगी। स्वास्थ्य जोखिम को समझने के लिए एक्सपोजर की मात्रा और लंबे समय तक होने वाले प्रभावों पर और शोध की जरूरत है।

लड़कियों ने लड़कों की तुलना में इस्तेमाल किए ज्यादा प्रोडक्ट्स

अध्ययन में लड़कियों और लड़कों के पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स के इस्तेमाल में भी अंतर देखने को मिला। लड़कियों ने पिछले 24 घंटे में औसतन 14 पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स इस्तेमाल करने की जानकारी दी, जो लड़कों की तुलना में करीब दोगुना था।

करीब 57 फीसदी छात्रों ने बताया कि उन्होंने पिछले 24 घंटे में फ्रेगरेंस या परफ्यूम का इस्तेमाल किया था।

सिर्फ 19 फीसदी छात्र नियमित रूप से पढ़ते हैं प्रोडक्ट लेबल

रिसर्च में यह भी सामने आया कि ज्यादातर किशोर पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स में मौजूद सामग्री को लेकर ज्यादा सावधान नहीं थे। केवल 19 फीसदी छात्र नियमित रूप से प्रोडक्ट का लेबल पढ़ते थे, जबकि महज 5 फीसदी छात्र ऐसे ऐप या वेबसाइट का इस्तेमाल करते थे, जो अपेक्षाकृत सुरक्षित प्रोडक्ट चुनने में मदद करती हैं।

इससे पता चलता है कि चिंता केवल पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स की संख्या को लेकर नहीं है, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण है कि किशोर उनमें मौजूद सामग्री के बारे में कितनी जानकारी रखते हैं।

रिसर्च में छात्रों की भी रही भागीदारी

इस अध्ययन की खास बात यह रही कि हाई स्कूल के दो छात्रों, गैब्रिएल कपुटा और वीटा मॉस-वांग, ने भी शोध टीम के साथ काम किया। उन्होंने सर्वे तैयार करने में मदद की और छात्रों के सोशल मीडिया इस्तेमाल से जुड़े सवाल शामिल करने का सुझाव दिया। बाद में दोनों इस वैज्ञानिक पेपर के सह-लेखक भी बने।रिसर्च की प्रमुख लेखिका एमिली बैरेट के अनुसार, अध्ययन में सोशल मीडिया का प्रभाव एक महत्वपूर्ण पहलू रहा। आमतौर पर बच्चों और किशोरों पर सोशल मीडिया के मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक विकास से जुड़े प्रभावों पर चर्चा होती है, लेकिन यह अध्ययन पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स के इस्तेमाल से जुड़े एक अलग पहलू की ओर ध्यान आकर्षित करता है।

किशोरावस्था में केमिकल एक्सपोजर को समझना जरूरी

किशोरावस्था शरीर में तेजी से बदलाव का दौर होता है और इस दौरान हार्मोन सिस्टम में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन होते हैं। ऐसे में शोधकर्ताओं का मानना है कि इस उम्र में विभिन्न रसायनों के संपर्क को कम करने के संभावित तरीकों को समझना महत्वपूर्ण हो सकता है।

हालांकि, शोधकर्ताओं ने सोशल मीडिया के कारण सीधे तौर पर स्वास्थ्य नुकसान होने का निष्कर्ष नहीं निकाला है। मौजूदा अध्ययन मुख्य रूप से सोशल मीडिया इस्तेमाल और पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स के उपयोग के बीच संबंध को दर्शाता है।शोधकर्ता अब यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि कौन से सोशल मीडिया अकाउंट, इन्फ्लुएंसर्स और मैसेज किशोरों के पर्सनल केयर प्रोडक्ट्स चुनने के फैसले को सबसे ज्यादा प्रभावित करते हैं।भविष्य में बड़े और ज्यादा विविध समूहों पर अध्ययन करने की जरूरत बताई गई है। शोधकर्ता छात्रों द्वारा इस्तेमाल किए गए प्रोडक्ट्स की जानकारी को उनके यूरिन सैंपल में मौजूद विभिन्न रसायनों के स्तर से जोड़कर भी अध्ययन करना चाहते हैं।

 

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