रांची । झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमेंटी के अध्यक्ष केशव महतो कमलेश ने कहा कि 4 अगस्त केवल एक पुण्यतिथि नहीं है, बल्कि झारखंड के लिए आत्ममंथन और संकल्प का दिन है। यह वह दिन है जब हम झारखंड आंदोलन के महानायक, पूर्व सीएम, पूर्व केंद्रीय मंत्री और करोड़ों वंचित, आदिवासी, किसान एवं मजदूरों की आवाज़ रहे दिशोम गुरु शिबू सोरेन को श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन सत्ता के लिए नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति के सम्मान, अधिकार और स्वाभिमान के लिए समर्पित कर दिया। झारखंड की मिट्टी, जंगल, पहाड़, संस्कृति और यहाँ के लोगों के अधिकारों के लिए उनका संघर्ष आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत रहेगा।
किसी भी महान व्यक्ति का जीवन केवल उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उसके संघर्षों से पहचाना जाता है। शिबू सोरेन जी का जीवन भी संघर्षों की अग्निपरीक्षा से होकर निकला। उनके पिता स्वर्गीय सोबरन सोरेन महाजनी प्रथा, सूदखोरी और आदिवासियों के आर्थिक शोषण के विरुद्ध आवाज़ उठाते थे। इसी संघर्ष के कारण उनकी हत्या कर दी गई। उस समय शिबू सोरेन युवा अवस्था में थे। पिता की असमय मृत्यु किसी भी परिवार को तोड़ सकती थी, लेकिन उन्होंने निराशा के स्थान पर संघर्ष का मार्ग चुना। उन्होंने अपने पिता के अधूरे सपनों को अपना जीवन लक्ष्य बना लिया। यही घटना उनके जीवन का सबसे बड़ा प्रेरणास्रोत बनी और यहीं से एक ऐसे जननेता का जन्म हुआ, जिसने आगे चलकर पूरे झारखंड की राजनीति और सामाजिक चेतना को नई दिशा दी।
शिबू सोरेन जी ने कभी राजनीति को सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं माना। उनके लिए राजनीति समाज परिवर्तन का साधन थी। उन्होंने गाँव-गाँव जाकर आदिवासियों, किसानों और मजदूरों को संगठित किया। वे लोगों को बताते थे कि जल, जंगल और जमीन केवल संसाधन नहीं, बल्कि उनकी पहचान और अस्तित्व हैं। उन्होंने महाजनी प्रथा और भूमि हड़पने की प्रवृत्ति के विरुद्ध व्यापक जनजागरण अभियान चलाया। धीरे-धीरे उनका संघर्ष जनआंदोलन में बदल गया और लोग उन्हें सम्मानपूर्वक “दिशोम गुरु” कहने लगे। यह उपाधि किसी राजनीतिक दल ने नहीं, बल्कि झारखंड की जनता ने उन्हें अपने प्रेम और विश्वास से दी थी।
गुरुजी के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता उनकी सादगी थी। वे मुख्यमंत्री बनने के बाद भी कभी आम जनता से दूर नहीं हुए। उनके जीवन से जुड़ा एक प्रसंग अक्सर पुराने कार्यकर्ता सुनाते हैं। एक बार किसी दूरस्थ गाँव में जनसभा के बाद प्रशासन ने उनके लिए विश्राम गृह और विशेष भोजन की व्यवस्था की थी। लेकिन उन्होंने अधिकारियों से कहा कि वे वही भोजन करेंगे जो गाँव के लोग खाते हैं। वे ग्रामीणों के साथ जमीन पर बैठकर भोजन करने लगे और देर रात तक उनकी समस्याएँ सुनते रहे। उन्होंने कहा था—यदि जनता जमीन पर बैठती है, तो उसका नेता कुर्सी पर बैठकर उसका दर्द नहीं समझ सकता। यही सादगी और अपनापन उन्हें लाखों लोगों के दिलों से जोड़ता था।
मुझे भी अनेक अवसरों पर गुरुजी का स्नेह और आशीर्वाद प्राप्त करने का सौभाग्य मिला। जब भी उनसे मिलने का अवसर मिलता, वे अत्यंत आत्मीयता से मिलते थे। उनके व्यक्तित्व में कोई बनावटीपन नहीं था। वे बड़े से बड़े नेता और छोटे से छोटे कार्यकर्ता के साथ समान व्यवहार करते थे। उनका मानना था कि राजनीति का वास्तविक उद्देश्य समाज की सेवा और जनता का विश्वास अर्जित करना है। उनके स्नेहिल शब्द और मार्गदर्शन आज भी मेरे लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। उन्होंने अनेक बार यह संदेश दिया कि संगठन की वास्तविक शक्ति उसके समर्पित कार्यकर्ता होते हैं, इसलिए कार्यकर्ताओं का सम्मान और संवाद कभी नहीं टूटना चाहिए।
झारखंड आंदोलन की चर्चा शिबू सोरेन जी के बिना अधूरी है। उन्होंने अलग झारखंड राज्य की माँग को केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं रहने दिया, बल्कि उसे सामाजिक अस्मिता और सम्मान के आंदोलन में बदल दिया। वर्षों तक उन्होंने कठिन परिस्थितियों में आंदोलन का नेतृत्व किया। अनेक उतार-चढ़ाव आए, राजनीतिक संघर्ष हुए, लेकिन उन्होंने अपने लक्ष्य से कभी समझौता नहीं किया। अंततः 15 नवंबर 2000 को झारखंड एक अलग राज्य बना। यद्यपि इस ऐतिहासिक निर्णय में अनेक नेताओं और संगठनों का योगदान था, फिर भी जनभावना को संगठित करने और आंदोलन को जन-जन तक पहुँचाने का सबसे बड़ा श्रेय दिशोम गुरु शिबू सोरेन को दिया जाता है।
मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री के रूप में भी उन्होंने जनहित को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। उन्होंने आदिवासी समाज, किसानों, ग्रामीण विकास, शिक्षा और सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों को लगातार उठाया। वे सदैव चाहते थे कि झारखंड केवल खनिज संपदा के लिए नहीं, बल्कि मानव विकास, शिक्षा और सामाजिक समानता के लिए भी देश में पहचान बनाए। उनका मानना था कि प्राकृतिक संसाधनों का पहला अधिकार उन लोगों का होना चाहिए जो पीढ़ियों से उन क्षेत्रों में रहते आए हैं।
उनका पूरा जीवन इस बात का प्रमाण है कि सच्चा जननेता वही होता है, जो जनता के बीच रहकर उनकी भाषा बोले, उनकी पीड़ा समझे और उनके संघर्ष को अपना संघर्ष बना ले। यही कारण है कि आज भी झारखंड के दूर-दराज़ गाँवों में लोग उन्हें श्रद्धा से याद करते हैं। उन्होंने राजनीतिक जीवन में अनेक कठिनाइयों का सामना किया, आलोचनाएँ भी झेलीं, लेकिन जनता से उनका विश्वास कभी नहीं टूटा।
वर्ष 2026 में भारत सरकार द्वारा उन्हें लोक सेवा के क्षेत्र में मरणोपरांत पद्म भूषण से सम्मानित किया जाना उनके लंबे सार्वजनिक जीवन और राष्ट्र के प्रति योगदान की औपचारिक राष्ट्रीय स्वीकृति है। यह सम्मान केवल शिबू सोरेन जी का नहीं, बल्कि झारखंड की उस संघर्षशील परंपरा का सम्मान है जिसने लोकतांत्रिक तरीकों से अपने अधिकारों के लिए दशकों तक संघर्ष किया।
आज उनकी पुण्यतिथि पर हम सबके लिए सबसे बड़ी श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके आदर्शों को अपने जीवन में अपनाएं। राजनीति को सेवा का माध्यम बनाएँ, समाज के कमजोर वर्गों के प्रति संवेदनशील रहें, लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करें और झारखंड की सामाजिक समरसता तथा सांस्कृतिक विरासत को मजबूत करने का संकल्प लें। आज जब सार्वजनिक जीवन में संवाद, विश्वास और जनसेवा की भावना को और सुदृढ़ करने की आवश्यकता है, तब दिशोम गुरु का जीवन हमें सही दिशा दिखाता है।
झारखंड प्रदेश कांग्रेस परिवार की ओर से मैं दिशोम गुरु शिबू सोरेन जी को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं। उनका संघर्ष, उनका त्याग, उनकी सादगी और उनका जनसेवा का भाव सदैव हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत रहेगा। वे भले ही आज हमारे बीच शारीरिक रूप से उपस्थित
नहीं हैं, लेकिन उनके विचार, उनका संघर्ष और झारखंड के प्रति उनका समर्पण सदैव इस राज्य की आत्मा में जीवित रहेगा।




