नई दिल्ली : शिक्षा का असली उद्देश्य क्या है? क्या यह सिर्फ किताबों का ज्ञान, डिग्रियां हासिल करने या अच्छी नौकरी पाने तक सीमित है? दिल्ली विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. भारद्वाज शुक्ल का मानना है कि ऐसा बिल्कुल नहीं है। उनके अनुसार शिक्षा वह माध्यम है जो व्यक्ति के संपूर्ण व्यक्तित्व का विकास करती है, उसे संस्कारित बनाती है, कर्तव्यबोध जगाती है और राष्ट्र के प्रति समर्पण का भाव पैदा करती है।
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उन्होंने कहा कि आज भारत एक बड़े वैचारिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। एक ओर शिक्षा का तेजी से तकनीकी और व्यावसायिक स्वरूप विकसित हुआ है, वहीं दूसरी ओर देश अपनी सांस्कृतिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक विरासत को फिर से स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। ऐसे समय में शिक्षा का लक्ष्य केवल रोजगार उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि ऐसे नागरिक तैयार करना होना चाहिए जो समाज और राष्ट्र के विकास में नेतृत्वकारी भूमिका निभा सकें।
शिक्षा का लक्ष्य केवल नौकरी नहीं, राष्ट्र निर्माण होना चाहिए
डॉ. शुक्ल के अनुसार आज की शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य युवाओं को केवल प्रतियोगी परीक्षाओं और नौकरी की दौड़ तक सीमित रखना नहीं होना चाहिए। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो भारतीय ज्ञान परंपरा, नैतिक मूल्यों और आत्मसम्मान से जुड़े व्यक्तित्व का निर्माण करे। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों के भीतर भारतीय संस्कृति, अपनी परंपराओं, पूर्वजों और देश के गौरवशाली इतिहास के प्रति सम्मान का भाव विकसित होना चाहिए। यदि युवाओं के मन में राष्ट्र सर्वोपरि का भाव होगा, तभी वे देश के लिए सकारात्मक योगदान देने में सक्षम बनेंगे।
मैकाले की शिक्षा व्यवस्था पर उठाए सवाल
लेख में ब्रिटिश शासनकाल की शिक्षा नीति का भी उल्लेख किया गया है। डॉ. शुक्ल का कहना है कि वर्ष 1835 में थॉमस बैबिंगटन मैकाले द्वारा तैयार की गई शिक्षा नीति का उद्देश्य भारतीय समाज का विकास नहीं था, बल्कि ऐसे लोगों की पीढ़ी तैयार करना था जो सोच और विचार से अंग्रेज बन जाएं। उनका कहना है कि स्वतंत्रता के बाद भी लंबे समय तक देश की शिक्षा व्यवस्था उसी मानसिकता से प्रभावित रही, जिसके कारण युवाओं में अपनी संस्कृति और ज्ञान परंपरा के प्रति हीन भावना पैदा हुई। उनका मानना है कि भारत को आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी बनाने के लिए इस मानसिक दासता से बाहर निकलना जरूरी है।
गुरुकुल शिक्षा को बताया वैज्ञानिक और व्यावहारिक मॉडल
डॉ. शुक्ल के अनुसार प्राचीन भारत की गुरुकुल व्यवस्था केवल धार्मिक शिक्षा तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह वैज्ञानिक, दार्शनिक और व्यावहारिक जीवन पद्धति पर आधारित थी। उन्होंने बताया कि गुरुकुलों में राजा और सामान्य परिवारों के बच्चे एक साथ शिक्षा ग्रहण करते थे, जिससे समानता और सेवाभाव विकसित होता था। वहीं प्रश्नोत्तर और तर्क आधारित शिक्षा पद्धति विद्यार्थियों में स्वतंत्र सोच और तार्किक क्षमता विकसित करती थी। उनका कहना है कि गुरुकुलों में वेदों के साथ-साथ गणित, खगोल विज्ञान, चिकित्सा, धातु विज्ञान और राजनीति जैसे विषयों की भी पढ़ाई होती थी।
भारतीय ज्ञान परंपरा को बताया वैज्ञानिक सोच का आधार
लेख में भारतीय वैज्ञानिक उपलब्धियों का भी उल्लेख किया गया है। डॉ. शुक्ल ने कहा कि महर्षि कणाद का परमाणु सिद्धांत, आर्यभट्ट की गणितीय खोजें, भास्कराचार्य के सिद्धांत, महर्षि सुश्रुत की शल्य चिकित्सा और महर्षि चरक का आयुर्वेद इस बात के प्रमाण हैं कि भारत की ज्ञान परंपरा अत्यंत समृद्ध रही है। उन्होंने दिल्ली के लौह स्तंभ का उदाहरण देते हुए कहा कि प्राचीन भारतीय धातु विज्ञान विश्व स्तर पर अत्यंत विकसित था।
संस्कृत और भारतीय ग्रंथों की उपयोगिता पर दिया जोर
डॉ. शुक्ल ने कहा कि संस्कृत केवल एक प्राचीन भाषा नहीं, बल्कि ज्ञान, विज्ञान और चेतना के विकास का माध्यम है। उन्होंने वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत और भगवद्गीता को केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि प्रबंधन, मनोविज्ञान, कूटनीति, नैतिकता और जीवन प्रबंधन के महत्वपूर्ण स्रोत बताया। उनका कहना है कि यदि इन ग्रंथों के मूल सिद्धांतों को आधुनिक शिक्षा में शामिल किया जाए तो विद्यार्थियों में सत्यनिष्ठा, कर्तव्यपरायणता और वैश्विक कल्याण की भावना मजबूत होगी।
आधुनिक शिक्षा और गुरुकुल परंपरा के समन्वय की जरूरत
डॉ. शुक्ल का मानना है कि आज शिक्षा केवल डिग्री और पैकेज तक सीमित होती जा रही है। इससे विद्यार्थियों की बौद्धिक क्षमता तो बढ़ती है, लेकिन नैतिकता और संवेदनशीलता कमजोर पड़ जाती है। उन्होंने कहा कि देश में कई ऐसे संस्थान हैं जो आधुनिक विज्ञान और प्राचीन भारतीय शिक्षा पद्धति के बीच संतुलन स्थापित कर रहे हैं। इनमें श्री स्वामीनारायण गुरुकुल इंटरनेशनल स्कूल, पतंजलि योगपीठ के आचार्याकुलम और गुरुकुलम तथा वृंदावन का भक्तिवेदांत गुरुकुल एंड इंटरनेशनल स्कूल प्रमुख हैं।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को बताया परिवर्तन का आधार
डॉ. शुक्ल ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP-2020) को भारतीय शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव लाने वाला दस्तावेज बताया। उनके अनुसार यह नीति भारतीय संस्कृति, स्थानीय आवश्यकताओं और आधुनिक वैश्विक शिक्षा के बीच संतुलन स्थापित करती है। उन्होंने कहा कि भारतीय शिक्षा बोर्ड (BSB) और राष्ट्रीय शिक्षा नीति मिलकर ऐसी व्यवस्था विकसित कर रहे हैं जिसमें गांवों के विद्यार्थियों को भी विश्वस्तरीय शिक्षा और अवसर मिल सकें।
विदेशी भाषाओं और रोजगारपरक शिक्षा पर भी दिया जोर
उन्होंने कहा कि नई शिक्षा व्यवस्था में मातृभाषा और भारतीय भाषाओं के साथ विदेशी भाषाओं के अध्ययन की सुविधा भी महत्वपूर्ण है। इससे भारतीय विद्यार्थी वैश्विक स्तर पर नेतृत्व करने में सक्षम बनेंगे और भारतीय संस्कृति का प्रभाव दुनिया तक पहुंचा सकेंगे। डॉ. शुक्ल का कहना है कि आज की शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो युवाओं को केवल नौकरी तलाशने वाला नहीं, बल्कि रोजगार देने वाला उद्यमी बनाए। शिक्षा का सीधा संबंध आर्थिक आत्मनिर्भरता और देश के विकास से होना चाहिए।
राष्ट्र सर्वोपरि की भावना से ही बनेगा विकसित भारत
लेख के अंत में डॉ. भारद्वाज शुक्ल ने कहा कि जब युवाओं में राष्ट्र सर्वोपरि की भावना विकसित होगी, तभी प्रतिभा पलायन रुकेगा और देश में अनुसंधान, नवाचार और स्वदेशी तकनीकों का विकास होगा। उन्होंने डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम, चंद्रयान, मंगलयान और NavIC जैसी उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए कहा कि राष्ट्रभक्ति और भारतीय ज्ञान परंपरा से प्रेरित शिक्षा ही भारत को आत्मनिर्भर और विकसित राष्ट्र बनाने का मार्ग प्रशस्त करेगी।
उनका निष्कर्ष है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और भारतीय शिक्षा बोर्ड भारत को औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर निकालकर आत्मसम्मान, सांस्कृतिक गौरव, आधुनिक विज्ञान और आर्थिक स्वावलंबन के मार्ग पर आगे बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। ऐसी शिक्षा व्यवस्था ही विकसित भारत के निर्माण की मजबूत नींव साबित होगी।




