रांची: झारखंड में सरकारी खजाने से जुड़ा एक बड़ा वित्तीय मामला सामने आया है। राज्य में गबन, वित्तीय दुरुपयोग, वसूली योग्य राशि, असमायोजित अग्रिम और अंकेक्षण आपत्तियों समेत कुल 18,060 करोड़ रुपये के वित्तीय मामले लंबित हैं। हैरानी की बात यह है कि जिन मामलों को निपटाकर राशि में कमी लाने का लक्ष्य तय किया गया था, उनकी कुल रकम पिछले पांच वर्षों में बढ़कर लगभग दोगुनी हो गई। अब इस मामले को लेकर वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने 22 अक्टूबर को विभागीय सचिवों की बैठक बुलाई है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि यह जनता का पैसा है और इसका पूरा हिसाब होना जरूरी है।
18,060 करोड़ रुपये के वित्तीय मामले लंबित
झारखंड में सरकारी धन के हिसाब-किताब और वित्तीय अनुशासन को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। राज्य में वर्ष 2021-22 से 2025-26 की अवधि से संबंधित विभिन्न वित्तीय मामलों की कुल राशि 18,060 करोड़ रुपये बताई गई है। इसमें गबन, वित्तीय दुरुपयोग, वसूली योग्य रकम, असमायोजित अग्रिम, अंकेक्षण आपत्तियां और जमा की जाने वाली राशि शामिल हैं।
इतनी बड़ी रकम से जुड़े मामलों का लंबित रहना सरकारी विभागों की जवाबदेही और वित्तीय प्रबंधन पर सवाल खड़े करता है। हालांकि, पूरी राशि को गबन या चोरी की रकम मानना सही नहीं होगा, क्योंकि इसमें अंकेक्षण आपत्तियों और अन्य मदों में दर्ज राशि भी शामिल है।
पांच साल में लगभग दोगुनी हो गई लंबित राशि
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2001 से 2022-23 तक के लंबित वित्तीय मामलों में 9,737 करोड़ रुपये दर्ज किए गए थे। तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ. रामेश्वर उरांव ने 5 अक्टूबर 2023 को इस मामले की समीक्षा की थी।
उस दौरान मार्च 2024 तक लंबित राशि में 50 प्रतिशत कमी लाने का लक्ष्य तय किया गया था। साथ ही वित्तीय व्यवस्था में सुधार के लिए बिहार की तर्ज पर मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक समिति गठित करने का निर्देश भी दिया गया था।
लेकिन अब सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2021-22 से 2025-26 की अवधि से संबंधित मामलों की राशि बढ़कर 18,060 करोड़ रुपये हो गई है। यानी वित्तीय मामलों के निपटारे और निगरानी की व्यवस्था पर फिर सवाल उठने लगे हैं।
22 अक्टूबर को सचिवों के साथ बैठक करेंगे वित्त मंत्री
मामले की गंभीरता को देखते हुए वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने 22 अक्टूबर को विभिन्न विभागों के सचिवों की बैठक बुलाई है। इससे पहले दो बार निर्धारित बैठकें नहीं हो सकी थीं।
इस बैठक में लंबित वित्तीय मामलों की स्थिति, अंकेक्षण आपत्तियों के निपटारे और वसूली योग्य राशि पर चर्चा होने की उम्मीद है। संबंधित विभागों से यह भी स्पष्ट करने को कहा जा सकता है कि पुराने मामलों के निपटारे में देरी क्यों हुई और वित्तीय जवाबदेही तय करने के लिए क्या कदम उठाए गए।
किस मद में कितनी राशि लंबित?
वर्ष 2021-22 से 2025-26 की अवधि के लिए उपलब्ध आंकड़ों में अलग-अलग मदों में बड़ी रकम दर्ज है।
वित्तीय मद
लंबित राशि
गबन
78.06 करोड़ रुपये
वित्तीय दुरुपयोग
9.14 करोड़ रुपये
वसूली योग्य राशि
5,215 करोड़ रुपये
असमायोजित अग्रिम
1,162 करोड़ रुपये
अंकेक्षण आपत्तियां
7,666 करोड़ रुपये
जमा की जाने वाली राशि
3,930 करोड़ रुपये
कुल 18,060 करोड़ रुपये (लगभग)
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि बड़ी रकम वसूली योग्य राशि, अंकेक्षण आपत्तियों और जमा की जाने वाली राशि से जुड़ी है। ऐसे मामलों में यह पता लगाना जरूरी है कि संबंधित विभागों ने अब तक क्या कार्रवाई की है और कितनी राशि का निपटारा किया जा चुका है।
राजस्व, स्वास्थ्य और पथ निर्माण विभाग पहले भी रहे निशाने पर
5 अक्टूबर 2023 को हुई समीक्षा बैठक में राजस्व, निबंधन एवं भूमि सुधार, स्वास्थ्य, पथ निर्माण और कृषि विभाग में बड़ी संख्या में वित्तीय अनियमितताओं और अंकेक्षण संबंधी आपत्तियों का उल्लेख किया गया था।
इसके अलावा स्कूली शिक्षा, उच्च शिक्षा, ग्रामीण विकास, नगर विकास, जल संसाधन, खान और परिवहन विभाग भी समीक्षा के दायरे में रहे हैं।
तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ. रामेश्वर उरांव ने उस समय झारखंड जैसे छोटे राज्य में इतनी बड़ी राशि से संबंधित अंकेक्षण आपत्तियों को चिंताजनक बताया था। अब एक बार फिर लंबित वित्तीय मामलों की बढ़ती रकम ने विभागीय निगरानी और जवाबदेही पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
‘यह लोकधन है, इसका हिसाब होना जरूरी’
वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने कहा कि यह गंभीर विषय उनके संज्ञान में है। उन्होंने कहा कि पहले लंबित 9,737 करोड़ रुपये की राशि में 50 प्रतिशत कमी लाने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन पिछले पांच वर्षों में यह रकम बढ़कर 18,060 करोड़ रुपये हो गई।
वित्त मंत्री के मुताबिक, राशि का बढ़ना बताता है कि पहले दिए गए निर्देशों का अपेक्षित अनुपालन नहीं हुआ। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह लोकधन है और इसका लेखा-जोखा होना बेहद जरूरी है।
उन्होंने कहा कि सरकार लंबित राशि की वसूली और संबंधित मामलों में कार्रवाई के लिए कदम उठाएगी।
अब विभागों की जवाबदेही पर नजर
22 अक्टूबर को होने वाली बैठक में यह देखना अहम होगा कि विभागवार कितनी राशि लंबित है, किन मामलों में वसूली संभव है और अंकेक्षण आपत्तियों के निपटारे में कहां बाधाएं आ रही हैं।
सरकार के सामने चुनौती केवल लंबित मामलों की समीक्षा करना नहीं, बल्कि वर्षों से अटकी वित्तीय प्रक्रियाओं को पूरा करना और जहां गड़बड़ी साबित हो, वहां जिम्मेदारी तय करना भी है। बैठक के बाद यह स्पष्ट हो सकेगा कि 18,060 करोड़ रुपये से जुड़े मामलों के निपटारे के लिए सरकार क्या समयबद्ध योजना बनाती है।




