ओस्लो : दक्षिण अफ्रीका की जानी-मानी कानूनविद् नवनीनम ‘नवी’ पिल्लई को साल 2026 का नोबेल शांति पुरस्कार मिला है। आज यानी शुक्रवार को नॉर्वे की राजधानी ओस्लो में इसकी घोषणा की गई। उन्हें अंतरराष्ट्रीय कानून को मजबूत करने और दुनिया में शांति को बढ़ावा देने के काम के लिए यह सम्मान दिया गया है। नवी पिल्लई ने अपने लंबे करियर में अंतरराष्ट्रीय कानून को मजबूत बनाने में काफी अहम काम किया है। रवांडा के अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण में जज रहते हुए उन्होंने ऐसे कानूनी सिद्धांतों को मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभाई, जिनके तहत दुष्कर्म और यौन हिंसा को मानवता के खिलाफ अपराध और नरसंहार का हिस्सा माना गया।
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The Norwegian Nobel Committee has decided to award the 2026 #NobelPeacePrize to Navanethem “Navi” Pillay for her efforts to promote peace and international law.#NobelPrize https://t.co/97vurspw6z
— The Nobel Prize (@NobelPrize) October 9, 2026
उनके योगदान से एक और ऐतिहासिक कानूनी मिसाल सामने आई। पहली बार केवल नफरत फैलाने वाले प्रचार के जरिए नरसंहार भड़काने के आरोप में किसी व्यक्ति पर मुकदमा चलाया गया। पिल्लई ने अपने काम से यह दिखाया कि कानून के जरिए युद्ध और हिंसा के मामलों में दोषियों को जवाबदेह ठहराया जा सकता है।
क्यों मिला नवी पिल्लई को नोबेल शांति पुरस्कार?
नवी पिल्लई को अंतरराष्ट्रीय कानून और शांति को बढ़ावा देने के लिए किए गए उनके असाधारण काम के लिए यह पुरस्कार दिया गया है। उन्होंने मानवाधिकारों की रक्षा और अंतरराष्ट्रीय न्याय व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए लंबे समय तक काम किया है। नोबेल समिति के मुताबिक, उनका करियर बताता है कि दुनिया में स्थायी शांति कायम करने के लिए न्याय, मानवाधिकार और कानून के शासन को मजबूत करना जरूरी है। उनके काम ने राज्यों और राष्ट्रीय नेताओं को जवाबदेह बनाने के साथ हिंसा और संघर्ष के पीड़ितों को न्याय दिलाने की उम्मीद भी मजबूत की है।
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दक्षिण अफ्रीका के डरबन में हुआ था जन्म
नवी पिल्लई का जन्म 23 सितंबर 1941 को दक्षिण अफ्रीका के डरबन में एक गरीब परिवार में हुआ था। वह भारतीय तमिल मूल की हैं। उनके दादा-दादी 1890 के दशक में भारत से दक्षिण अफ्रीका गए थे। पिल्लई ने कानून के क्षेत्र में कई ऐतिहासिक उपलब्धियां हासिल कीं। वह दक्षिण अफ्रीका के उच्च न्यायालय में जज बनने वाली पहली गैर-श्वेत महिला थीं। इसके अलावा, हार्वर्ड लॉ स्कूल से कानून में डॉक्टरेट की डिग्री हासिल करने वाली वह पहली दक्षिण अफ्रीकी नागरिक भी हैं।
संयुक्त राष्ट्र में भी निभा चुकी हैं अहम जिम्मेदारी
नवी पिल्लई साल 2008 से 2014 तक संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार उच्चायुक्त रह चुकी हैं। उन्होंने रवांडा के लिए अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण (आईसीटीआर) की अध्यक्ष और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आईसीसी) की न्यायाधीश के रूप में भी काम किया है। रवांडा न्यायाधिकरण में उनके काम को अंतरराष्ट्रीय आपराधिक कानून के इतिहास में अहम माना जाता है। ‘अकायेसु मामले’ में बलात्कार और यौन हिंसा को नरसंहार के अपराध से जोड़कर देखने की ऐतिहासिक कानूनी मिसाल स्थापित हुई। इस मामले ने यौन हिंसा के पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून की भूमिका को मजबूत किया।
फलस्तीनी क्षेत्रों में मानवाधिकार उल्लंघनों की जांच से भी जुड़ी हैं
नवी पिल्लई फलस्तीनी क्षेत्रों में मानवाधिकार उल्लंघनों की जांच से जुड़े संयुक्त राष्ट्र के स्वतंत्र जांच आयोग के काम का नेतृत्व भी कर चुकी हैं। मानवाधिकार और अंतरराष्ट्रीय कानून के क्षेत्र में उनके लंबे अनुभव ने उन्हें दुनिया की प्रमुख न्यायविदों में शामिल किया है।
नोबेल शांति पुरस्कार के 125 साल पूरे
इस साल नोबेल शांति पुरस्कार की शुरुआत के 125 साल पूरे हो रहे हैं। पहला नोबेल शांति पुरस्कार साल 1901 में दिया गया था। इस पुरस्कार का मकसद अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना और विवादों का शांतिपूर्ण समाधान तलाशने के प्रयासों को सम्मान देना रहा है। नोबेल समिति के अनुसार, नवी पिल्लई का काम अंतरराष्ट्रीय कानून को मजबूत बनाने और मानव गरिमा की रक्षा करने में जुटे लोगों के लिए प्रेरणा है। उनका करियर इस बात को सामने रखता है कि शांति कायम करने के लिए सिर्फ संघर्ष रोकना ही काफी नहीं, बल्कि पीड़ितों को न्याय दिलाना और जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह बनाना भी जरूरी है।



