रांची। झारखंड के पांकुड़ शहर के बीचोंबीच शहीद सिद्धो-कान्हू मुर्मू पार्क में खड़ा मार्टिलो टावर पहली नजर में भले ही एक पुरानी ऐतिहासिक इमारत लगे, लेकिन इसकी हर ईंट 1855-56 के संथाल हूल की गवाही देती है। यह वही टावर है, जिसे अंग्रेजों ने अपनी सुरक्षा के लिए बनवाया था। इरादा था संथाल विद्रोह को दबाने का, लेकिन वक्त ने इसे अंग्रेजी हुकूमत की ताकत नहीं, बल्कि आदिवासी वीरों के अदम्य साहस का प्रतीक बना दिया।
हर साल 30 जून को हूल दिवस के मौके पर जब लोग सिद्धो, कान्हू, चांद और भैरव को याद करते हैं, तब मार्टिलो टावर भी इतिहास के उन पन्नों को जैसे फिर से खोल देता है। यहां आने वाला हर व्यक्ति यही सोचता है कि आखिर उस दौर में कैसा रहा होगा, जब जंगलों और पहाड़ों से हजारों संथाल अंग्रेजों के खिलाफ उठ खड़े हुए थे। समयऔर कैलेंडर
जब अंग्रेजों को सताने लगा था विद्रोह का डर
इतिहासकार बताते हैं कि संथाल हूल ने अंग्रेजी शासन की नींव हिला दी थी। संथाल समाज अब अत्याचार, बेगारी, महाजनों और जमींदारों के शोषण के खिलाफ खुलकर मैदान में उतर चुका था। विद्रोह की लपटें तेजी से फैल रही थीं। ऐसे में अंग्रेज अधिकारियों ने महसूस किया कि यदि समय रहते रणनीति नहीं बनाई गई तो हालात उनके हाथ से निकल सकते हैं। इसी दौरान तत्कालीन अनुमंडल पदाधिकारी सर मार्टिन के निर्देश पर वर्ष 1856 में इस टावर का निर्माण कराया गया। इसका मकसद साफ था। ऊंचाई से दूर-दूर तक नजर रखना और विद्रोहियों की हर गतिविधि पर नजर बनाए रखना।
करीब 27 फीट ऊंचे इस टावर का बाहरी व्यास लगभग 17 फीट है। इसकी दीवारों में 52 छोटे-छोटे छेद बनाए गए हैं। साथ ही दो खिड़कियां और एक मजबूत दरवाजा भी बनाया गया। इन छिद्रों से अंग्रेज सैनिक बाहर का पूरा इलाका देखते थे और जरूरत पड़ने पर यहीं से गोलीबारी भी करते थे। मजबूत और गोलाकार बनावट के कारण यह टावर उस समय अंग्रेजों की सुरक्षा चौकी माना जाता था।
धनुष पूजा से शुरू हुआ था विद्रोह का संकल्प
पाकुड़ के इतिहास से जुड़े जानकार बताते हैं कि अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई शुरू होने से पहले बड़ी संख्या में संथाल आदिवासी धनुष पूजा गांव में इकट्ठा हुए थे। वहां उन्होंने अपने पारंपरिक हथियारों की पूजा की और अन्याय के खिलाफ संघर्ष का संकल्प लिया। इसी वजह से इस गांव का नाम धनुष पूजा पड़ा। यहीं से संथाल हूल की चिंगारी और तेज हुई। जब अंग्रेजों को इसकी खबर मिली तो उन्होंने अपनी सुरक्षा बढ़ाने के लिए जल्दबाजी में मार्टिलो टावर बनवाया। लेकिन इतिहास गवाह है कि टावर, बंदूकें और सैनिक भी संथालों के हौसले को पूरी तरह नहीं रोक सके। सिद्धो-कान्हू और उनके साथियों ने अंग्रेजी सत्ता को खुली चुनौती दी और आजादी की लड़ाई का ऐसा अध्याय लिखा, जिसे देश कभी नहीं भूल सकता।
आज इतिहास का जीवंत साक्षी है मार्टिलो टावर
आज यह टावर भारतीय पुरातत्व और स्थानीय इतिहास की महत्वपूर्ण धरोहरों में गिना जाता है। हूल दिवस पर यहां लोगों की भीड़ उमड़ती है। स्कूली बच्चे, शोधकर्ता, इतिहास प्रेमी और पर्यटक इस टावर को देखने पहुंचते हैं और संथाल हूल के बारे में जानकारी जुटाते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि मार्टिलो टावर सिर्फ अंग्रेजों की बनाई इमारत नहीं है। यह उस संघर्ष की निशानी है, जिसने आदिवासी समाज के स्वाभिमान और अधिकारों की लड़ाई को नई पहचान दी। इसलिए इसे सिर्फ एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि प्रेरणा स्थल के रूप में भी देखा जाता है।
नई पीढ़ी को इतिहास से जोड़ने की जरूरत
इतिहासकार मानते हैं कि हूल दिवस केवल एक स्मृति दिवस नहीं, बल्कि अपने इतिहास को समझने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने का अवसर भी है। मार्टिलो टावर जैसी धरोहरें हमें याद दिलाती हैं कि आजादी की लड़ाई सिर्फ बड़े शहरों तक सीमित नहीं थी। जंगलों, गांवों और आदिवासी इलाकों में भी ऐसे वीर पैदा हुए, जिन्होंने अपने जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए अंग्रेजी हुकूमत से सीधी टक्कर ली।
आज जब हूल दिवस पर पूरा संथाल परगना सिद्धो-कान्हू और उनके साथियों को नमन करता है, तब पाकुड़ का मार्टिलो टावर भी मानो खामोशी से यही संदेश देता है कि संघर्ष और बलिदान की कहानियां कभी पुरानी नहीं होतीं। समय बदलता है, लेकिन इतिहास अपनी पहचान हमेशा कायम रखता है।



